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तृणमूल के 28 साल, अस्मिता की राजनीति को दिया नया रूप

Updated at : 02 Jan 2026 12:31 AM (IST)
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तृणमूल के 28 साल, अस्मिता की राजनीति को दिया नया रूप

नववर्ष के साथ ही तृणमूल कांग्रेस अपनी स्थापना के 28वें वर्ष और एक नये चुनावी चक्र में प्रवेश कर चुकी है.

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कोलकाता, एजेंसियां

नववर्ष के साथ ही तृणमूल कांग्रेस अपनी स्थापना के 28वें वर्ष और एक नये चुनावी चक्र में प्रवेश कर चुकी है. पार्टी जहां अपनी वैचारिक स्थिति को नये सिरे से गढ़ रही है, वहीं वह बंगाली ‘अस्मिता’ को ‘बंगाली हिंदू पहचान’ की अधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति के साथ जोड़ रही है, ताकि अपने पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक को असहज किये बिना हिंदू समर्थन को मजबूत किया जा सके और साथ ही भाजपा के तुष्टीकरण के विमर्श का मुकाबला किया जा सके.

एक जनवरी, 1998 को कांग्रेस से अलग होकर वाममोर्चे के जमे-जमाये शासन को चुनौती देने के उद्देश्य से स्थापित तृणमूल 2011 में ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के इर्द-गिर्द जमीनी स्तर पर हुए व्यापक जनआंदोलन के दम पर सत्ता में आयी थी. करीब 15 वर्षों से सत्ता में रहने के बाद पार्टी ने न सिर्फ इस साल अपना स्थापना दिवस मनाया, बल्कि एक पूरे चुनावी चक्र में प्रवेश कर चुकी है. 2026 के विधानसभा चुनाव महज करीब तीन महीने दूर हैं और पार्टी एक बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का सामना कर रही है, जहां अस्मिता की राजनीति अधिक तीखी हो चुकी है और भाजपा के साथ मुकाबला और भी कड़ा होता जा रहा है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति में भी यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है. उन्होंने दक्षिण बंगाल के दीघा में करीब 213 फुट ऊंचे जगन्नाथ मंदिर, कोलकाता में दुर्गा मंदिर और सांस्कृतिक परिसर और सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर जैसी कई मंदिर परियोजनाओं के उद्घाटन या निर्माण की घोषणा की है.

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने निजी तौर पर स्वीकार किया है कि यह प्रयास भाजपा द्वारा ममता बनर्जी को अल्पसंख्यक तुष्टीकरण से प्रेरित नेता के रूप में लगातार पेश किये जा रहे आरोपों का जवाब देने के उद्देश्य से किया गया है. वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा पर तृणमूल का वोट अंतर लगभग 61 लाख वोट से घटकर 2024 के लोकसभा चुनाव में लगभग 42 लाख रह गया, जिससे विधानसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर चिंता बढ़ गयी है.

राजनीति विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती इसे सोच-समझकर बनायी गयी, लेकिन जोखिम भरी रणनीति बताते हैं. उन्होंने कहा : वह मुसलमानों के खिलाफ खड़े हुए बिना बंगाली हिंदुओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं. एक अन्य विश्लेषक ने कहा कि बंगाल के राजनीतिक विमर्श के भीतर बनर्जी के दृष्टिकोण को तेजी से हिंदुत्ववादी के रूप में वर्णित किया जा रहा है. हिंदू राष्ट्र के विचार को खारिज करते हुए ममता बनर्जी ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में ‘चंडी पाठ’ का पाठ करने से लेकर भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के साथ विधानसभा में तीखी बहस के दौरान अपने ब्राह्मण वंश का हवाला देने तक, अपने व्यक्तिगत विश्वास को अधिक स्पष्ट रूप से सामने रखा है, जबकि वह ईद और क्रिसमस समारोहों में हिस्सा लेना जारी रखती हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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AKHILESH KUMAR SINGH

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