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भारत, नेपाल व भूटान हिंदू राष्ट्र घोषित हों : शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद

Updated at : 14 Jan 2020 2:52 AM (IST)
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भारत, नेपाल व भूटान हिंदू राष्ट्र घोषित हों : शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद

सागरद्वीप : मकर संक्रांति स्नान के लिए गंगासागर पहुंचे पुरी के श्रीगोवर्धन मठ के शंकराचार्य पीठाधीश्वर स्वामी निश्चलानंद ने सोमवार को कहा कि संयुक्त राष्ट्रसंघ का दायित्व बनता है कि वह विश्वस्तर या राष्ट्रीय स्तर पर न्याय पीठ की स्थापना करे. पाकिस्तान, बांगलादेश या अरब के किसी देश में अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति उत्पीड़न का […]

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सागरद्वीप : मकर संक्रांति स्नान के लिए गंगासागर पहुंचे पुरी के श्रीगोवर्धन मठ के शंकराचार्य पीठाधीश्वर स्वामी निश्चलानंद ने सोमवार को कहा कि संयुक्त राष्ट्रसंघ का दायित्व बनता है कि वह विश्वस्तर या राष्ट्रीय स्तर पर न्याय पीठ की स्थापना करे.

पाकिस्तान, बांगलादेश या अरब के किसी देश में अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति उत्पीड़न का शिकार होता है तो संयुक्त राष्ट्रसंघ की न्यायपीठ उसके मानवाधिकारों की रक्षा करे. अगर पीड़ित व्यक्ति अपना देश छोड़ना चाहता है तो उसे दूसरे किसी मुस्लिम देश में बसाया जाये. वहीं अगर कोई हिंदू किसी मुस्लिम या ईसाई देश में पीड़ित हो तो उसे हिंदू राष्ट्र में बसने की अनुमति दी जाये.

सबसे जरूरी है कि भारत, नेपाल व भूटान को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाये. उन्होंने कहा कि धर्म एक दीर्घकालीन राजनीति है एवं राजनीति एक अल्पकालीन धर्म है. धर्मविहीन राजनीति भ्रष्टाचार की जननी है एवं पाखंड को जन्म देती है. वर्तमान में देश में धर्मविहीन राजनीति का साम्राज्य कायम है. मैं किसी दल विशेष का नहीं, बल्कि रामराज्य व धर्मराज्य का पक्षधर हूं.

स्वामी जी आगे कहते हैं कि सागर आते हुए मुझे 20 साल हो गये. इस दौरान राज्य सरकार की ओर से यहां के विकास के लिए जो प्रयास किये जा रहे हैं वह प्रशंसनीय है, लेकिन राज्य व केंद्र को इस बात का ध्यान रखना होगा कि सुविधा व विकास के नाम पर तीर्थस्थलों की मर्यादा व मौलिकता को हर हालत में कायम रखना होगा. तभी तीर्थस्थलों का महत्व बरकरार रहेगा.

वरना यह पर्यटन के नाम पर मात्र पिकनिक स्पॉट बन जायेगा, क्योंकि धर्म व आस्था धैर्य का विषय है. साथ ही तीर्थयात्रियों को किसी भी प्रकार की समस्या न हो इसका भी पर्याप्त ध्यान रखना प्रशासन का दायित्व है.

आखिर में उन्होंने कहा कि धार्मिक व आध्यात्मिक स्थलों के विकास के बारे में एक राजनेता उस तरह से नहीं सोच सकता जैसे एक धर्मवेत्ता सोचता है. इसलिए राज्य व केंद्र को धर्मगुरुओं से परामर्श लेना चाहिए.

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