प्रिंट मीडिया विश्वसनीय दस्तावेज के रूप में हमेशा बना रहेगा
Updated at : 30 Aug 2019 1:47 AM (IST)
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कोलकाता : मीडिया को प्रजातंत्र का चाैथा स्तम्भ माना जाता है. प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बाद आज सोशल मीडिया का प्रचलन बढ़ गया है. फिर भी अखबारों की विश्वसनीयता व क्रेज बना रहेगा. सोशल मीडिया पर भरोसा नहीं किया जा सकता है. ऐसी प्रतिक्रिया प्रभात खबर की ओर से आयोजित एक विशेष परिचर्चा […]
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कोलकाता : मीडिया को प्रजातंत्र का चाैथा स्तम्भ माना जाता है. प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बाद आज सोशल मीडिया का प्रचलन बढ़ गया है. फिर भी अखबारों की विश्वसनीयता व क्रेज बना रहेगा. सोशल मीडिया पर भरोसा नहीं किया जा सकता है. ऐसी प्रतिक्रिया प्रभात खबर की ओर से आयोजित एक विशेष परिचर्चा सत्र में बुद्धिजीवियों ने व्यक्त की. जानते हैं इस विषय में अलग-अलग क्षेत्र के बुद्धिजीवियों की राय:
जय प्रकाश सिंह (चेयरमैन, सिल्वन प्लाई): सोशल मीडिया के कारण आंतरिकता व संवेदनाएं कहीं शिथिल हो गयी हैं. जिसे देखिये, वह फेसबुक व व्हाटसएप के जरिये ज्ञान बांट रहा है. किसी सीमा तक ठीक है लेकिन इसकी अति ठीक नहीं है. हमको तो सुबह चाय के साथ प्रभात खबर पहले चाहिए. भले ही बेटा दूसरा पेपर देखता है लेकिन हमारी प्राथमिकता अखबार ही है. अखबारों का भरोसा हमेशा पाठकों के साथ बना रहेगा.
हरेराम कात्यायन (शिक्षक) : आज ग्लोबल स्तर पर सोशल मीडिया का प्रचलन है, लेकिन विश्वसनीयता के मामले में प्रिंट मीडिया का कोई जवाब नहीं. पहले रेडियो लोग ज्यादा सुनते थे. फिर टीवी आया. अब एन्ड्राइड मोबाइल का जमाना है. मोबाइल पर ही लोग सारे अखबार ऑनलाइन जाकर पढ़ सकते हैं. फिर भी छपी हुई चीज एक दस्तावेज के रूप में हमेशा प्रासंगिक रहेगी.
जगदीश शरण अग्रवाल (बिजनेसमैन) : सोशल मीडिया में हर आदमी पत्रकार व एडिटर बना हुआ है. जिसे जो मन हुआ, उसने अपने हिसाब से पोस्ट या सूचना जारी कर दी. यह किसी मामले में ठीक है, लेकिन कई बार गलत सूचनाएं भी आ जाती हैं. हालांकि अखबारों के मामले में भी पीत पत्रकारिता के आरोप लगते रहे हैं, फिर भी प्रिंट मीडिया को विश्वस्त दस्तावेज के रूप में हमेशा सम्मान मिलता रहेगा.
प्रकाश किल्ला (टैक्स सलाहकार) : यह सही है कि आज सोशल मीडिया के जरिये लोग लोकप्रिय हो रहे हैं. कई लोगों का हुनर भी दुनिया के सामने आ रहा है. यह इसका सकारात्मक पहलू है लेकिन कई बार सोशल मीडिया पर भ्रामक चीजें भी आ जाती है. इससे हमें बचना चाहिए. प्रिन्ट मीडिया को आसानी से चुनौती नहीं दी जा सकती है जबिक सोशल मीडिया में आचार संहिता का उल्लंघन भी हो जाता है.
शशि लाहोटी (समाजसेवी): हमारे लिए तो सुबह की चुस्ती बिना अखबार के अधूरी है. चाय के साथ पहले समाचार पत्र देखना हमारी आदत है, यह कभी नहीं जायेगी. प्रिन्ट मीडिया से लोगों का भरोसा हमेशा बना रहेगा, भले ही आज सोशल मीडिया कितना भी आगे बढ़ जाये. देश में अभी भी कई लोग सोशल मीडिया से बाहर हैं. उनको फेसबुक या ट्विटर का कोई ज्ञान नहीं है लेकिन वे अखबार जरूर पढ़ते हैं.
अजय तिवारी (शिक्षक): आज के दौर में सोशल मीडिया कई बिछड़े हुए लोगों को मिलाने का काम भी कर रहा है लेकिन कई बार ऐसी पोस्ट फेसबुक पर आ जाती है, जिससे लोग गुमराह हो जाते हैं. अप्रासंगिक पोस्ट भेजने वाले के खिलाफ दंड का प्रावधान होना चाहिए. यही फेसबुक का दुष्प्रभाव है लेकिन अखबारों के साथ ऐसा नहीं है. अखबार पढ़ने से से एक अलग ही संतोष मिलता है, इसमें तथ्य व सोर्स भी रहते हैं, जिससे लोग भरोसा करते हैं.
अनूप राय (कोल इंडिया लि. अधिकारी) : सोशल मीडिया पर उतना ही भरोसा करना चाहिए, जितना हम जानते हैं. जो कुछ पोस्ट किया जाता है, वह सब सत्य या प्रासंगिक नहीं हो सकता है. आज की युवा पीढ़ी, इससे भटक भी रही है. गार्जियन को अपने बच्चों पर निगरानी रखने के साथ हर समय सोशल मीडिया पर चिपके रहने की अनुमति नहीं देनी चाहिए. अखबारों की विश्वसनीयता पहले भी थी, हमेशा बनी रहेगी.
एबी गुही (ईसीएल, हैडक्वार्टर) : समाचारपत्रों में जो भी छपता है, उसके सोर्स ज्ञात होते हैं, उसका रिकार्ड रहता है लेकिन सोशल मीडिया में बहुत कुछ अननोन रहता है. फेसबुक पर कौन क्या पोस्ट कर रहा है, कुछ पता ही नहीं चलता है. अखबारों की विश्वसनीयता हमेशा बनी रहेगी.
डॉ अविलाश गोंड (प्रोफेसर, एजेसी बोस, कॉलेज) : अखबार बौद्धिक वर्ग की पहली प्राथमिकता आज भी है, पहले भी थी. हां, आज फेसबुक, व्हाटसअप व टिवटर का जमाना है, इससे लोग काफी कनेक्ट व इनफोरमेटिव हो रहे हैं लेकिन इसका नकारात्मक पहलू यह है कि युवा पीढ़ी झोंक की तरह सोशल मीडिया पर चिपकी रहती है. यंगस्टर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की बजाय टिक टोक बनाने व चैटिंग में ही अपना समय नष्ट कर रहे हैं.
कार्तिक चौधरी (प्रोफेसर, महाराजा श्रीशचंद, कॉलेज): देश के लगभग साढ़े 19 करोड़ लोग फेसबुक पर हैं और देखा जाये तो सोशल मीडिया के कारण ही ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन व निर्भया कांड जैसे अभियान भारी सफल हुए. हाशिये पर गये लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने में भी इसकी भूमिका है लेकिन इसका नकारात्मक पहलू यह है कि इससे साइबर क्राइम भी बढ़ रहा है लेकिन प्रिन्ट मीडिया आज भी सजीवता व प्रासंगिकता बनाये हुए है.
देवाशीष शील (संयोजक, सरकारी कर्मचारी परिषद) : सोशल मीडिया कितना भी छाया रहे लेकिन प्रिन्ट मीडिया का महत्व हमेशा बना रहेगा. प्रिन्ट मीडिया में खबरों की सत्यता बनी रहती है, जबकि फेसबुक व व्हाट्सअप पर कई बार फेक चीजें भी आ जाती हैं. जैसे सोशल मीडिया पर देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली के देहांत से तीन दिन पहले ही उनको मृत बताया जा रहा था. उनकी श्रद्धांजलि सभा भी की जा रही थी. ऐसी फेक चीजों से बचना चाहिए.
राजीव मिश्रा (शिक्षक) : सोशल मीडिया ने हमारी सोच को बांट दिया है. बच्चों में अभी ऑनलाइन गेम जैसे पब्जी आदि का क्रेज बढ़ गया है, यह अच्छा संकेत नहीं है. सकारात्मक पहलू यह है कि फेसबुक के जरिये सूचनाओं का विस्तार हो रहा है, फिर भी प्रिंट मीडिया का आकर्षण व महत्व कभी कम नहीं हो सकता है. सुबह की शुरुआत अखबार से ही होती है.
विष्णु राम (सोशल मीडिया मार्केटर) : फेसबुक पर कई चीजें वाइरल होने से फायदा भी है, नुकसान भी. आज सोशल मीडिया की क्रांति आ गयी है, लोग हर क्षेत्र में मार्केटिंग के लिए भी इसका प्रयोग कर रहे हैं. कई बार फेक न्यूज भी आ जाती है, या फेसबुक से कई चीजें रिमूव हो जाती हैं, लेकिन प्रिंट मीडिया एक प्रमाण के तौर पर हमेशा सजीव रहता है. अखबार एक सोलिड मीडिया है.
अनिमेष कर (सदस्य, सरकारी कर्मचारी परिषद) : अखबारों का दौर हमेशा रहेगा. सबसे पहले सुबह आदमी अखबार ही पढ़ता है. सोशल मीडिया कितना भी हावी रहे लेकिन तथ्यों के मामले में प्रिन्ट मीडिया हमेशा भरोसेमंद विकल्प के रूप में रहेगा.
स्मिता दे (सोशल मीडिया मार्केटर) : आज के दौर में सोशल मीडिया बहुत पावरफुल है. इसी के जरिये हमको एक प्रोजेक्ट में आर्थिक सहायता भी मिली. हां…कई बार फेक व यूजलेस चीजें भी वाइरल हो जाती हैं. टेक्नोलॉजी का उपयोग व दुरुपयोग अपने ऊपर निर्भर करता है. प्रिंट मीडिया का विकल्प सोशल मीडिया नहीं हो सकता.
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