एक बार लगाएं, 30 साल तक कमाएं, ड्रैगन फ्रूट की खेती पर योगी सरकार दे रही 1.62 लाख की सब्सिडी

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ड्रैगन फ्रूट की खेती पर योगी सरकार दे रही सब्सिडी (AI सांकेतिक तस्वीर)

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UP News: उत्तर प्रदेश के मथुरा में भूजल स्तर को देखते हुए उद्यान विभाग किसानों को ड्रैगन फ्रूट की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. इस योजना के तहत सरकार प्रति हेक्टेयर 1.62 लाख रुपये तक की सब्सिडी दे रही है.

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UP News: उत्तर प्रदेश के मथुरा में घटते भूजल स्तर को देखते हुए उद्यान विभाग किसानों को कम पानी में अधिक मुनाफा देने वाली ड्रैगन फ्रूट (कमलम) की खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. इस योजना के तहत सरकार किसानों को प्रति हेक्टेयर 1.62 लाख रुपये तक की सब्सिडी दे रही है, ताकि जल संरक्षण के साथ उनकी आय भी बढ़ाई जा सके.

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कम सिंचाई में लंबे समय तक मिलेगा लाभ

उद्यान विभाग के अनुसार ड्रैगन फ्रूट ऐसी बागवानी फसल है, जिसे पारंपरिक खेती की तुलना में काफी कम पानी की जरूरत होती है. एक बार पौधे लगाने के बाद यह करीब 25 से 30 वर्षों तक उत्पादन देते हैं. बढ़ती बाजार मांग और अच्छे दाम मिलने की वजह से यह किसानों के लिए लाभकारी विकल्प बनकर उभर रहा है. मथुरा के नौहझील ब्लॉक के शंकरगढ़ी गांव में कुछ किसान पहले से इसकी व्यावसायिक खेती कर रहे हैं.

स्वास्थ्य के साथ आय का भी बेहतर विकल्प

ड्रैगन फ्रूट स्वाद के साथ-साथ पोषण और स्वास्थ्य लाभ के लिए भी जाना जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक इसमें कई ऐसे पोषक तत्व पाए जाते हैं जो शरीर के लिए फायदेमंद हैं. जिला उद्यान अधिकारी डॉ. प्रशांत कुमार सिंह ने बताया कि जल संरक्षण और किसानों की आमदनी बढ़ाने के उद्देश्य से विभाग ड्रैगन फ्रूट के साथ खजूर और स्ट्रॉबेरी जैसी फसलों की खेती को भी बढ़ावा दे रहा है.

किसानों को बेहतर मुनाफे की उम्मीद

शंकरगढ़ी गांव के किसान मनीष सिंह ने बताया कि उन्होंने पिछले वर्ष पांच बीघे में ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू की थी. इस बार पौधों पर अच्छी मात्रा में फल आए हैं और उन्हें लागत निकलने के साथ बेहतर मुनाफे की उम्मीद है. उन्होंने बताया कि मथुरा के अलावा आगरा और दिल्ली के बाजारों में भी इसकी अच्छी मांग है.

ड्रिप सिंचाई से होगी पानी की बचत

ड्रैगन फ्रूट की खेती में टपक (ड्रिप) सिंचाई प्रणाली अपनाने पर 40 से 60 प्रतिशत तक पानी की बचत की जा सकती है. इस तकनीक में पानी सीधे पौधों की जड़ों तक बूंद-बूंद पहुंचता है, जिससे पानी की बर्बादी कम होती है और फसल को आवश्यक नमी लगातार मिलती रहती है. यही वजह है कि कम पानी वाले क्षेत्रों में इस खेती को बेहतर विकल्प माना जा रहा है.

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