बलिया बलिदान दिवस: आज के ही दिन 1942 में आजाद हुआ था ये जिला, जानें नाम के साथ 'बागी' जुड़ने की दास्तान
Published by : Sanjay Singh Updated At : 19 Aug 2023 1:17 PM
1942 में आज ही के दिन जनपद बलिया में ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लेते हुए सैकड़ों क्रांतिकारी जेल से स्वतंत्र कराए गए थे, जिससे बलिया को देश में सबसे पहले आजाद होने का गौरव प्राप्त हुआ था. महान क्रांतिकारी चित्तू पांडेय के नेतृत्व में लड़ी गई यह लड़ाई अविस्मरणीय है.
Ballia Balidan Diwas: उत्तर प्रदेश आज बलिया बलिदान दिवस को याद करते हुए इस आंदोलन के शहीदों को नमन कर रहा है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मौके पर क्रांतिकारी चित्तू पांडेय की शहादत को याद किया.
उन्होंने कहा कि भारतीय शौर्य के परिचायक, ‘बलिया बलिदान दिवस’ के पावन अवसर पर मां भारती के सभी वीर सपूतों को नमन है. महान क्रांतिकारी चित्तू पांडेय के नेतृत्व में सन 1942 में आज ही के दिन उत्तर प्रदेश के बलिया में अंग्रेजों के विरुद्ध हुए संघर्ष ने स्वतंत्रता की प्रथम अनुभूति कराई थी.
परिवहन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और बलिया सदर से विधायक दयाशंकर पांडेय ने कहा कि बलिया बलिदान दिवस’ पर मां भारती के सपूतों को कोटिशः नमन व भावभीनी श्रद्धांजलि. सन 1942 में आज ही के दिन जनपद बलिया में ब्रिटिश हुकूमत से लोहा लेते हुए सैकड़ों क्रांतिकारी जेल से स्वतंत्र कराए गए थे, जिससे बलिया को देश में सबसे पहले आजाद होने का गौरव प्राप्त हुआ था. महान क्रांतिकारी चित्तू पांडेय के नेतृत्व में लड़ी गई यह लड़ाई अविस्मरणीय है.
दरअसल महर्षि भृगु की धरा बलिया यूं ही पूरे देश में नायाब नहीं है. इसी मिट्टी के लाल, अमर सेनानी मंगल पांडेय ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहली बगावत का बिगुल फूंका तो देश को आजादी मिलने के पांच साल पहले ही बगावती तेवर के बूते क्रांतिवीर चित्तू पांडेय की अगुवाई में आजाद होने का स्वर्णिम इतिहास भी बलिया के नाम दर्ज है. अन्याय का प्रतिकार और देश हित में बलिदान, बागी बलिया की खास पहचान है.
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बागी बलिया शब्द को इतिहास के पन्नों में खंगाले तो इसके अर्थ में विरोध से अधिक राष्ट्रीय व्यापक लक्ष्य के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा नजर आता है. लोगों के दिलों में बलिया को 19 अगस्त 1942 को बागी का खिताब मिला था. इस तारीख से दस दिन पहले महात्मा गांधी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा देकर बर्तानिया हुकूमत के खिलाफ निर्णायक आंदोलन शुरू किया था.
महात्मा गांधी के नारे की गूंज पूरे हिंदुस्तान में थी. लेकिन, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मेरठ की सैन्य छावनी से पहली बगावत करने वाले मंगल पांडेय की जन्मभूमि बलिया में अलग ही जुनून था. इस जुनून को परवान चढ़ाने वाले गांधीवादी क्रांतिकारी चित्तू पांडेय थे. गांधीवादी क्रांतिकारी इसलिए कि उनके रगों में जोश व जज्बा मंगल पांडेय सरीखा था और वह अनुयायी महात्मा गांधी के थे. उनकी अगुवाई में स्थानीय स्तर पर गांधीवादी आंदोलनों में भी जुनून अधिक नजर आता था.
अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे पर अमल करते हुए बलिया में लोग चित्तू पांडेय के नेतृत्व में पूरी तरह बगावत पर आमादा हो गए. इस बीच चित्तू पांडेय व उनके साथियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया. इसके बाद बलिया में क्रांति की ऐसी मशाल जली, जिसमें आम जनता से लेकर किसान, व्यापारी, युवा और छात्र तक कूद पड़े.
उत्तर प्रदेश के बलिया में आज के ही दिन 19 अगस्त 1942 को बैरिया थाना से अंग्रेजों का जैक उतार कर फेंक दिया गया था और जांबाज क्रांतिवीरों ने गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच थाने पर तिरंगा फहरा दिया था. इसमें 19 क्रांतिकारी अंग्रेजों की गोलियों से छलनी होकर शहीद हो गए और तीन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की यातना से जेल में दम तोड़ दिया था.
शहीद क्रांतिकारियों की याद में प्रत्येक वर्ष की इस तरह बार भी विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं. आजादी के आंदोलन के दौरान आज के दिन बलिया के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत की जंजीर तोड़कर खुद को स्वतंत्र घोषित कर लिया था. उन्होंने खुद की शासन व्यवस्था भी लागू कर स्वतंत्र बलिया प्रजातंत्र नाम रखा और इसका मुख्यालय हनुमानगंज कोठी को बनाया.
क्रांतिकारी चित्तू पांडेय ने 22 अगस्त 1942 तक यहां की सरकार भी चलाई, जिसे ब्रिटिश हुकूमत को सीधी चुनौती माना गया और पूरे देश में इसकी चर्चा हुई. इसके बाद 23 अगस्त की रात अंग्रेजों ने दोबारा यहां कब्जा कर लिया.
शेर-ए-बलिया चित्तू पांडेय के नेतृत्व में जेल में बंद सेनानियों ने फाटक तोड़कर खुद को आजाद कर जिलाधिकारी की कुर्सी पर कब्जा कर खुद को कलेक्टर नामित कर दिया था. बलिया की आजादी की गूंज लंदन तक गूंजी थी. इस लड़ाई में 84 लोग शहीद हो गए. इस आजादी की लड़ाई के बाद पूरे देश में बल मिल गया. इस आजादी को पूरा जिला बलिया बलिदान दिवस के रूप में हर वर्ष 19 अगस्त को उक्त आंदोलन में जान गंवाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर मनाता है.
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू की गिरफ्तारी के बाद जिला प्रशासन ने चित्तू पांडेय को साथियों जगन्नाथ सिंह और परमात्मानंद सिंह के साथ गिरफ्तार कर लिया. इससे बलिया की जनता काफी आक्रोशित थी. इस बीच नौ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के साथ-साथ कांग्रेस कार्यसमिति के सभी सदस्य गिरफ्तार कर अज्ञात जगह भेज दिए गए. इसके विरोध में इसी दिन से आंदोलन की चिंगारी भड़क उठी , जिसने ब्रिटिश हुकुमत को हिलाकर रख दिया.
बलिया में हर प्रमुख स्थानों पर प्रदर्शन और हड़तालें शुरू हो गईं. तार काटने, रेल लाइन उखाड़ने, पुल तोड़ने, सड़क काटने, थानों और सरकारी दफ्तरों पर हमला करके उन पर राष्ट्रीय झंडा फहराने के काम में जनता पूरी तरह से जुट गई. 14 अगस्त को वाराणसी कैंट से विश्वविद्यालय के छात्रों की आजाद ट्रेन बलिया स्टेशन पहुंची. इसकी जानकारी लगते ही सभी स्कूलों के छात्र-छात्राएं क्लास छोड़ आंदोलन में शामिल हो गए. युवा छात्र-छात्राओं के साथ आने से जनता का जोश कई गुना बढ़ गया.
इसके बाद 15 अगस्त को पांडेयपुर गांव में गुप्त बैठक हुई. इस दौरान तय किया गया कि 17 और 18 अगस्त तक तहसीलों तथा बलिया जनपद के प्रमुख स्थानों पर कब्जा कर 19 अगस्त को हमला किया जाएगा. 17 अगस्त की सुबह रसड़ा बैरिया, गड़वार, सिकंदरपुर, हलधरपुर, नगरा, उभांव आदि स्थानों पर जनता ने धावा बोल कब्जा कर लिया. इसके बाद आंदोलनकारियों ने 18 अगस्त तक 15 थानों पर हमला करके आठ थानों को पूरी तरह जला दिया. कई रेलवे स्टेशन फूंके गए. सैकड़ों जगह रेल की पटरियां उखाड़ी गईं. 18 पुलिसकर्मी मारे गए. कई पुलिसकर्मियों के हथियार छीन लिए गए.
बलिया जनपद के सभी तहसीलों पर कब्जा करने के बाद 19 अगस्त को जनता बलिया के जनपद मुख्यालय पहुंची. जेल के बाहर करीब 50 हजार की संख्या में लोग हाथों में हल, मूसल, कुदाल, फावड़ा, हसुआ, गुलेल, मेटा में सांप व बिच्छू भरकर अपने नेता चित्तू पांडेय व उनके साथियों की रिहाई की मांग कर रहे थे.
लोगों का आक्रोश देखकर तत्कालीन जिलाधिकारी जगदीश्वर निगम और पुलिस अधीक्षक रियाजुद्दीन को मौका पर आना पड़ा और दोनों अधिकारियों ने जेल के अंदर जाकर आंदोलनकारियों से बात की. इसके बाद चित्तू पांडेय, राधामोहन सिंह, विश्वनाथ चौबे, जगन्नाथ सिंह सहित 150 सत्याग्रहियों को रिहा कर दिया. इसके बाद जनपद के सभी सरकारी संस्थानों पर राष्ट्रीय सरकार का पहरा बैठा दिया गया. सारे सरकारी कर्मचारी पुलिस लाइन में बंद कर दिए गए.
शहीद होने वालों में कौशल सिंह के अलावा गोन्हिया छपरा निवासी निर्भय कुमार सिंह, देवबसन कोइरी, विशुनपुरा निवासी नरसिंह राय, तिवारी के मिल्की निवासी रामजनम गोंड, मिल्की मठिया के विद्यापति गोंड, चांदपुर निवासी रामप्रसाद उपाध्याय, टोलागुदरीराय निवासी मैनेजर सिंह, सोनबरसा निवासी रामदेव कुम्हार और बैरिया निवासी रामबृक्ष राय का नाम शामिल है.
इसके अलावा रामनगीना सोनार, छठू कमकर, देवकी सोनार, शुभनथही निवासी धर्मदेव मिश्र, मुरारपट्टी निवासी श्रीराम तिवारी, बहुआरा निवासी मुक्तिनाथ तिवारी, श्रीपालपुर निवासी विक्रम सोनार व विक्की राम, भगवानपुर निवासी भीम अहीर ने भी अपना बलिदान दिया.
वहीं दयाछपरा निवासी गदाधरनाथ पांडेय, मधुबनी निवासी गौरीशंकर राय, गंगापुर निवासी रामरेखा शर्मा सहित तीन क्रांतिकारी जेल यातना में शहीद हो गए. इसके अलावा कई अन्य अज्ञात क्रांतिकारियों को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया.
बलिया बलिदान दिवस पर पुलिस लाइन के परेड ग्राउंड में आयोजित जनसभा में डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने कहा कि बलिया साधारण धरती नहीं है. इसका अपना इतिहास रहा है. बलिया बलिदान दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर पूरे प्रदेश की ओर से यहां के वीर क्रांतिकारियों को नमन करता हूं. 1942 की क्रांति को साझा करते हुए कहा, गांधी जी के ‘करो या मरो‘ के नारे को यूं तो पूरे देश ने सुना, लेकिन बलिया के वीरों ने उसे हृदय से लगाकर आंदोलन में बढ़ चढ़कर प्रतिभाग किया. नतीजन, अंग्रेजों को उन क्रांतिकारियों के आगे झुकना पड़ा. उन्होंने कहा कि हम सबका अब यह कर्तव्य है कि इस आजादी को अक्षुण्य बनाए रखें.
इस मौके पर परिहवन मंत्री दयाशंकर सिंह की ओर से एकमात्र जीवित सेनानी रामविचार पाण्डेय को चार पहिया वाहन तथा 75 सेनानी परिजनों को इलेक्ट्रिक स्कूटी देकर सम्मानित किया गया. डिप्टी सीएम ने सभी के हाथ में चाभियां सौंपी. उन्होंने परिवहन मंत्री के इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि जिन्होंने देश की आजादी में अपनी जान दे दी, उनसे महत्वपूर्ण कोई हो ही नहीं सकता. इस अवसर पर उन क्रांतिकारियों के परिजनों के सम्मान की पहल अत्यंत सराहनीय है. सांसद दिनेश लाल यादव सहित अन्य अतिथियों ने भी इस पहल की सराहना की.
परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने कहा कि सेनानी रामविचार पाण्डेय आजादी के लड़ाई के जीता जागता गवाह है. एक दिन शहर में उनको देखा कि अपने लड़के के साथ वृद्धावस्था में स्कूटर से कहीं जा रहे थे. उनके लड़के से कार की उपलब्धता के बारे में पूछा तो बताया कि बैंक में आईटीआर मांगा जा रहा है, जो नहीं है. उनके द्वारा कार खरीदने में असमर्थता जाहिर करने के बाद मैंने ठान लिया कि मौका मिला तो कार जरूर दूंगा. फिर मैंने अपने वेतन की धनराशि से कार खरीद कर देने का निर्णय किया. आज बलिया बलिदान दिवस पर इस कार को देकर जो खुशी हो रही है, उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकता.
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By Sanjay Singh
working in media since 2003. specialization in political stories, documentary script, feature writing.
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