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यूपी चुनाव में ब्राह्मण वोटों पर सियासी बाण चलाने की फिराक में राजनीतिक दल

Updated at : 27 Jul 2016 9:38 PM (IST)
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यूपी चुनाव में ब्राह्मण वोटों पर सियासी बाण चलाने की फिराक में राजनीतिक दल

आशुतोष के पांडेय लखनऊ : जिस तरह वर्तमान राजनीति में जोड़-तोड़ और गठजोड़ एक सत्य है. उसी तरह यूपी की सियासत में जाति एकस्वीकार्य सच है. उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इस बार सभी पार्टियों की नजरें ब्राह्मण वोटों पर केंद्रित हो गयी हैं. राजनीतिक जानकार हाल में ब्राह्मण वोटों के प्रति राजनीतिक दलों […]

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आशुतोष के पांडेय

लखनऊ : जिस तरह वर्तमान राजनीति में जोड़-तोड़ और गठजोड़ एक सत्य है. उसी तरह यूपी की सियासत में जाति एकस्वीकार्य सच है. उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इस बार सभी पार्टियों की नजरें ब्राह्मण वोटों पर केंद्रित हो गयी हैं. राजनीतिक जानकार हाल में ब्राह्मण वोटों के प्रति राजनीतिक दलों केउमड़े प्रेमको कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकार प्रशांत किशोर केहालिया दिये गये एक बयान से जोड़कर देखते हैं. पीके ने कहा था कि यूपी जीतना है, तो ब्राह्मणों में पैठ बनाना पड़ेगा. हालांकि यूपी के पिछले राजनीतिक परिणामों को देखा जाय तो ऐसा नहीं लगता. इससे पहले भी राजनीतिक दल ब्राह्मण वोटों को लुभाने के लिये पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित कई इलाकों में विशेषब्राह्मण सम्मेलन कराते रहे हैं. इसकी वजहशीशे की तरह साफ है. वह है, यूपी में ब्राह्मण मतों का 20 फीसदी होना. राज्य में लगभग 10 प्रतिशत जनसंख्या ब्राह्मणों की है. यह जनसंख्या किसी भी राजनीतिक दल के लिये सत्ता के करीब पहुंचने की सीढ़ी बन सकती है.

ब्राह्मण वोटों पर निगाह क्यों ?

राजनीतिक जानकारों की माने तो बाबरीमस्जिद गिरायेजाने की घटना से पहले ब्राह्मणों का मत कांग्रेस के साथ था. उसके बाद ब्राह्मणों का वोट अचानक भाजपा की तरफ शिफ्ट हुआ. वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में देखा जाये तो 2012 में ब्राह्मणों के 19 प्रतिशत वोट समाजवादी पार्टी को मिले. सपा की सरकार भी बनी. सपा से पहले बसपा ने ब्राह्मणों पर डोरे डाले थे और अच्छी खासी संख्या में ब्राह्मणों को विधान सभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया था. कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर को इस बार साफ दिख रहा है कि 1990 के बाद से ब्राह्मण वोटों पर राज करने वाली बीजेपी इस बार अपना पूरा जोर दलितों को लुभाने में लगा रही है. इन्हीं बातों ने कांग्रेस में उम्मीद जगायी है कि भाजपा से टूटे हुए ब्राह्मण एक बार फिर कांग्रेस को सपोर्ट कर सकते हैं. यूपी की सत्ता से 27 साल दूर रही कांग्रेस को ब्राह्मण वोटों में उम्मीद की किरण नजर आ रही है. शीला दीक्षित को मैदान में उतारना इसी रणनीति का एक हिस्सा कहा जा सकता है ?

बसपा-सपा और ब्राह्मण वोट

दूसरी ओर अतिपिछड़ों और दलितों को अपनी राजनीति का मुख्य आधारमानने वाली बसपा की नजर भी इस बार ब्राह्मण वोटों पर है. जरा गौर कीजिये, बसपा ने 2007 में सबसे ज्यादा 86 ब्राह्मणों को विधानसभा चुनाव में टिकट दिया. बसपा सफल रही. सत्ता तक पहुंच भी गयी. 2007 की जीत में ब्राह्मण वोटों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही और मायावती को यूपी की सत्ता हासिल हुई. गत लोकसभा चुनाव में बसपा ने ब्राह्मणों के वोट पर सियासी वाण चलाने के लिये 40 ब्राह्मण सम्मलेन कर डाले. बसपा ने नारा भी दिया. ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी दिल्ली जायेगा. हालांकि नयी दिल्ली से उठी नरेंद्र मोदी की आंधी ने बहन जी के इस ख्वाब को चकनाचूर कर दिया और लोकसभा चुनाव में बसपा की बोलती बंद हो गयी. उधर मुस्लिम, यादव और अति पिछड़ा की राजनीति कर प्रचंड बहुमत के रथ पर सवार होकर सत्ता पर काबिज हुई सपा को भी लगता है कि बिना ब्राह्मण वोटों के जीत की नैया पार नहीं लगेगी. सपा ने भी ब्राह्मण वोटों के लिये अभी से हाथ पांव मारने शुरू कर दिये हैं.

बड़े वोट बैंक वाली जातियां और ब्राह्मण वोट

पहली बार भाजपाने जब ब्राह्मणोंमें अपना विश्वास व्यक्त किया तो 221 सीट जीतकर बीजेपी यूपी की सत्ता पर काबिज हो गयी थी. राजनीति ने करवट ली और यूपी की सियासत में बीजेपी ने ब्राह्मणों की अनदेखी करनी शुरू कर दी. भाजपा से ब्राह्मणों ने दूरी बनायी. जिसके परिणामस्वरूप 2007 और 2009 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में दिखा. पार्टी को 2007 के विधानसभा चुनाव में मात्र 40 सीटें मिली वहीं 2009 के लोकसभा चुनाव में मात्र 10 सीट. 404 विधानसभा सीट वाले यूपी में ब्राह्मणों से पहले सबसे बड़ा वोट बैंक पिछड़े वर्ग का है. पूरे प्रदेश में सवर्ण जातियां सिर्फ 18 प्रतिशत है. हां, यह बात जरूर है कि इस 18 प्रतिशत में ब्राह्मण 10 प्रतिशत हैं. राज्य में पिछड़े वर्ग की संख्या 39 प्रतिशत है, जिसमें यादव 12 प्रतिशत, कुर्मी, सैथवार आठ प्रतिशत और जाट पांच प्रतिशत जबकि मल्लाह चार प्रतिशत हैं. स्वाभाविक है सत्ता का केंद्र बिंदू बनने के लिये ब्राह्मणों के साथ-साथ बाकी जाति पर भी निगाह रखनी होगी. राजनीतिक पंडितों की माने तोयूपीचुनाव में ब्राह्मणों का साथयदिकिसी दल को मिलता है, तो निष्कर्ष निराश करने वाले नहीं होंगे.

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