Mahashivratri 2022: काशी में जब पांडवों ने की पंचक्रोशी परिक्रमा, 5 शिवलिंग के रूप में अवतरित हुए भोलेनाथ

Updated at : 01 Mar 2022 7:46 AM (IST)
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Mahashivratri 2022: काशी में जब पांडवों ने की पंचक्रोशी परिक्रमा, 5 शिवलिंग के रूप में अवतरित हुए भोलेनाथ

Mahashivratri 2022: अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने काशी में पंचक्रोशी परिक्रमा की थी. इस दौरान उन्होंने शिवपुर में पांच शिवलिंग स्थापित कर आराधना की थी और यहीं पर रात्रि विश्राम किया था.

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Varanasi News: महाशिवरात्रि के पावन मौके पर आज हम आपको बताने जा रहे हैं काशी नगरी की पंचक्रोशी परिक्रमा और उसके महत्व के बारे में. यहां धर्म संस्कृति से जुड़े अनेकों कालखंड का समायोजन है. ऐसा ही एक शिवपुर में पंचक्रोशी रोड स्थित एक मंदिर है, जिसके बारे में मान्यता है कि यहां पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान भगवान शिव की आराधना की थी.

पांडवों ने की काशी में पंचक्रोशी परिक्रमा

इसे पांच पाण्डव मन्दिर कहा जाता है. काशी खंड के अनुसार, अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने काशी में पंचक्रोशी परिक्रमा की थी. इस दौरान उन्होंने शिवपुर में पांच शिवलिंग स्थापित कर आराधना की थी और यहीं पर रात्रि विश्राम किया था. ऐसी मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नुकल और सहदेव ने की थी.

पंचक्रोशी यात्रा का चौथा पड़ाव है

द्वापर युग से जुड़ा ये मन्दिर काशी क्षेत्र के अंतर्गत आता है और ये पंचक्रोशी यात्रा का चौथा पड़ाव है. यहां पांच शिवलिंग पंच पांडेश्वर के नाम से जाने जाते हैं. अन्नमय, प्राणमय, ज्ञानमय, विज्ञानमय, आनन्दमय ये पांचों अर्थ को समाहित किए हुए पंच पाण्डव शिवलिंग कि स्थापना पांचों पांडव ने की थी.

पांच शिवलिंग के रूप में अवतरित हुए भोलेनाथ

भगवान शिव अकेले भी प्रकट हो सकते थे, मगर वे पांचों पांडव भाईयों की तपस्या से प्रसन्न होकर पांच शिवलिंग के रूप में अवतरित हुए. यहां दर्शन करने के उपरांत अन्न, प्राण, विज्ञान, आनन्द, ज्ञान इन पांचों अर्थ को जो प्राप्त करता है उसकी ही पंचक्रोशी यात्रा पूर्ण मानी जाती हैं. शिवपुर में स्थित पांचों पांडव मंदिर में अवरोही क्रम में पांच विभिन्न आकार के पांच शिवलिंग है. ये शिवलिंग पांडवों द्वारा स्थापित किए गए थे. शिवपुराण में वर्णन है कि पांडवों की पंचक्रोशी यात्रा के दौरान भगवान शिव ने यहीं पर पांडवों को दर्शन दिए थे.

पूरी होती हैं मनोकामनाएं

मंदिर के पास स्थित जल कुंड को द्रौपदी कुंड के नाम से जाना जाता है. जब द्रौपदी को प्यास लगी थी तो अर्जुन ने इस कुंड का निर्माण किया था. कुंड का जल पीने से किसी भी तरह का ज्वर संबंधित रोग ठीक हो जाता है. एक मंदिर माता द्रौपदी के कुंड के सामने है. यहां पीला मिष्ठान, पुष्प अर्पित करने से मनोकामना पूर्ण होती है. पांडवों ने जब पंच कोष की यात्रा मणिकर्णिका कुंड के कर्मदेश्वर महादेव से प्रारंभ किया था. उनकी यह यात्रा भीमचण्डी होते हुए शिवपुर पहुंचे थे. जहां पांचों पांडवों ने मंदिर स्थापित कर चौथा पड़ाव निर्धारित किया था.

80 किमी की है पूरी यात्रा

यहां से आखरी पड़ाव कपिलधारा होता है, जहां से माथा टेक भक्त वापस मणिकर्णिका जाते हैं. पूरी यात्रा 80 किमी की होती है. पांडवों ने एक दिन में पूरी यात्रा को किया था. मंदिर में द्रौपदी के साथ पांचों पांडवों की मूर्ति भी स्थापित है. ये भी कहा जाता है कि यहां के कुंड के अंदर सीढ़िया भी थी. जो अब विलुप्त हो गयी हैं. शिवरात्रि के दौरान यहां अत्यधिक भीड़ होती है.

रिपोर्ट- विपिन सिंह

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