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Coronavirus Pandemic: गुजरात और महाराष्ट्र को जोड़ने वाली राजस्थान की इस सीमा पर हर दिन जमा होती है हजारों लोगों की भीड़

thousands people crossing ratanpur border of rajasthan after coronavirus lockdown दिल्ली के आनंद विहार बस टर्मिनल पर मौजूद प्रवासियों की भीड़ ने पूरे देश को विचलित कर दिया था. पूरे देश का मीडिया उसका लाइव कवरेज कर रहा था, लेकिन कई और इलाके हैं, जहां मीडिया पहुंचता ही नहीं. ऐसी एक जगह है रतनपुर. राजस्थान और गुजरात को जोड़ने वाला बॉर्डर है रतनपुर. लॉकडाउन की घोषणा के बाद से लगातार कई दिनों से यहां हजारों लोग जुटते हैं. अपनी हैसियत के हिसाब से अलग-अलग वाहनों में सवार होकर राजस्थान के अपने गांवों को जा रहे हैं.

जयपुर : भारत ने कभी ऐसे हालात का सामना नहीं किया. कोरोना वायरस की वजह से पूरे देश में लॉकडाउन है. केंद्र और राज्य सरकारें बार-बार अपील कर रही हैं कि आप जहां हैं, वहीं रहें. आपकी जरूरत का हर सामान उपलब्ध होगा. यदि आप अपने घरों से बाहर निकले, तो कोरोना वायरस को फैलने में मदद करेंगे. इससे भारी संख्या में लोग बीमार पड़ेंगे और उनको इलाज उपलब्ध कराना मुश्किल हो जायेगा. चीन, इटली और अमेरिका जैसे हालात हो जायेंगे. लेकिन, लोगों की अपनी समस्या है. उनके पास काम नहीं है. पैसे नहीं हैं. मकान मालिक घर से निकाल रहा है. खाने को कुछ नहीं है. इसलिए लोग अपने घरों की ओर पलायन कर रहे हैं.

शनिवार को दिल्ली के आनंद विहार बस टर्मिनल पर मौजूद प्रवासियों की भीड़ ने पूरे देश को विचलित कर दिया था. पूरे देश का मीडिया उसका लाइव कवरेज कर रहा था, लेकिन कई और इलाके हैं, जहां मीडिया पहुंचता ही नहीं. ऐसी एक जगह है रतनपुर. राजस्थान और गुजरात को जोड़ने वाला बॉर्डर है रतनपुर. लॉकडाउन की घोषणा के बाद से लगातार कई दिनों से यहां हजारों लोग जुटते हैं. अपनी हैसियत के हिसाब से अलग-अलग वाहनों में सवार होकर राजस्थान के अपने गांवों को जा रहे हैं.

रोजगार की तलाश में ये लोग गुजरात और महाराष्ट्र जाते हैं. अब जबकि रोजगार चौपट हो गया, तो वहां रहकर करेंगे क्या? कमायेंगे नहीं, तो खायेंगे क्या? और फिर दिहाड़ी मजदूरों को सरकार की किस योजना का लाभ मिलना है, जिसका वे इंतजार करें. सरकार घोषणाएं तो कर रही हैं, लेकिन उसका लाभ इन लोगों तक पहुंच भी पा रहा है या नहीं, इसको देखने वाला कोई नहीं है. यही वजह है कि इन मजदूरों की चिंता बढ़ गयी और सभी लोग अपने-अपने घर लौटने लगे. इनका कहना है कि दिन भर कमाते हैं, तो रात और अगली सुबह के भोजन का इंतजाम होता है. जब कमायेंगे ही नहीं, तो खायेंगे कैसे. भूख से मरने से तो बेहतर है कि अपनों के बीच बीमारी से ही मर जायें.

ऐसा नहीं है कि अपने घरों को लौटने वालों में सिर्फ मजदूर वर्ग के ही लोग हैं. कुछ नौकरीपेशा लोग हैं, तो कुछ छात्र भी हैं. छात्रों से कह दिया गया कि वे हॉस्टल या पीजी खाली करके चले जायें. उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है. वहीं, कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो सोचते हैं कि जान है तो जहान है. क्यों न घर पर ही रहें. ट्रेनें और बसें बंद हैं. लेकिन, मजबूरी में जहां-तहां फंसे लोगों की जिद है कि वे अपने घर पहुंचकर रहेंगे. गाड़ी मिली तो ठीक, नहीं तो पैदल ही चले जायेंगे. यही वजह है कि लोग रिक्शा में, टेंपो में, ट्रॉला में सवार होकर रतनपुर बॉर्डर पर पहुंच रहे हैं.

लॉकडाउन के बाद महाराष्ट्र और गुजरात से आने वाले राजस्थान के लोगों को यहीं रोका जा रहा है. पहले स्वास्थ्य से जुड़े कुछ सवालों के साथ लिस्टिंग होती है और फिर मेडिकल की टीमें चेकअप करती हैं. अंतिम जांच के बाद मेडिकल स्टाफ हाथ पर सील लगा देते हैं तो उस व्यक्ति को आगे की यात्रा की अनुमति मिल जाती है. वैसे लगभग सभी लोगों को यात्रा की अनुमति यहां से मिल ही जाती है. लोगों को आगे बढ़ने की अनुमति देने के साथ यह भी निर्देश दिया जाता है कि वे अगले 14 दिन अपने घर में ही रहें. यानी क्वारेंटाइन अर्थात् होम आइसोलोशन में रहें. यह भी बताया जा रहा है कि अगर सर्दी-जुकाम, खांसी और बुखार हो, तो तुरंत हॉस्पिटल में जाकर डॉक्टर से चेकअप करवायें.

काफी संख्या में ऐसे लोग भी हैं, जो अपनी बाइक से ही अपने घरों को निकल पड़े हैं. पैदल और बाइक से यात्रा करने वाले ये लोग जब सफर में थक जाते हैं, तो हाइ-वे पर ही सो जाते हैं. डिवाइडर पर गमछा या चादर बिछायी और सो गये. आखिर इतने लंबे सफर में थोड़ा आराम भी तो जरूरी है. इस मुश्किल घड़ी में डॉक्टरों की बड़ी टीम दिन-रात काम कर रही है. मेडिकल टीम की मानें, तो हर दिन 15 से 20 हजार लोग रतनपुर बॉर्डर के रास्ते राजस्थान में प्रवेश कर रहे हैं. उनकी टीम एक सप्ताह से (22 मार्च, 2020 से) यहां तैनात है. लोगों के घर जाने की जिद के आगे प्रशासन ने भी घुटने टेक दिये हैं. ऐसे लोगों के लिए छोटी-बड़ी 100 से ज्यादा गाड़ियों के इंतजाम किये गये हैं.

Mithilesh Jha
Mithilesh Jha
मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है। उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवरेज करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है। मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है

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