रेलवे पार्क में धूम रहे जानवर बच्चों का बचपन घरों में कैद

Updated at : 29 Nov 2017 5:15 AM (IST)
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रेलवे पार्क में धूम रहे जानवर बच्चों का बचपन घरों में कैद

चक्रधरपुर : रेलवे पोर्टरखोली व लोको कॉलोनी के बीच स्थित बाल उद्यान रखरखाव के अभाव में जर्जर होने के कारण बच्चों का बचपन कैद हो गया है. पार्क में लगाये झूले समेत अन्य मनोरंजन के साधन नहीं बचे हैं. इस कारण बच्चे भी अब यहां खेलने नहीं आते हैं. स्कूल से आने के बाद बच्चों […]

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चक्रधरपुर : रेलवे पोर्टरखोली व लोको कॉलोनी के बीच स्थित बाल उद्यान रखरखाव के अभाव में जर्जर होने के कारण बच्चों का बचपन कैद हो गया है. पार्क में लगाये झूले समेत अन्य मनोरंजन के साधन नहीं बचे हैं. इस कारण बच्चे भी अब यहां खेलने नहीं आते हैं. स्कूल से आने के बाद बच्चों का अधिकांश समय टीवी पर या फिर मोबाइल पर वीडियो गेम खेलने में व्यतीत होता है. ऐसे में बच्चों का मानसिक व शारीरिक विकास प्रभावित हो रहा है.

एक समय था जब उद्यान में खेल संसाधनों के अलावा फाउंटन आदि सुविधाएं थी, शाम में पार्क बच्चों से भरा रहता था. लेकिन रेलवे की उदासीनता व सुरक्षा के अभाव में बाल उद्यान का अस्तित्व अब मिटने के कगार पर है. मालूम हो कि वर्ष 2002 में तत्कालीन डीआरएम शिवचंद्र झा ने पोर्टरखोली बाल उद्यान का उदघाटन किया था. अब पार्क असामाजिक तत्वों का अड्डा बन गया है. यहां मवेशी या तो विचरण करते हैं, या फिर उन्हें टूटे झूलों के पोल पर बांध दिया जाता है.

दोनों कॉलोनी में करीब ढाई हजार लोग : कॉलोनियों में लगभग 800 क्वार्टर है, जिसमें करीब 2500 लोग रहते हैं. यहां के अधिकांश ग्रुप डी रेलकर्मी हैं. इनमें लोको पायलट व संरक्षा व परिचालन विभाग के कर्मचारी हैं.
जर्जर है पार्क, इसलिए बच्चों का समय टीवी
दपू रेलवे इएम स्कूल के छात्र पोटरखोली निवासी शिवम रवानी व स्नेहा प्रमाणिक ने कहा कि वे पार्क में खेलने नहीं जाते हैं. मैदान में शराब बोतलों का टुकड़ा बिखरा रहता है. सिर्फ रविवार को सेरसा स्टेडियम पार्क जाते हैं. पोर्टरखोली निवासी मुन्नी शर्मा, कुंती देवी व कल्पना साकरवड़े ने कहा कि बच्चों के लिए खेलने की कोई सुविधा नहीं है. पार्क गंदगी से भरा है. शाम को असामाजिक तत्वों का अड्डा रहता है. बच्चों की जिद पर उन्हें खेलने के लिए रेल लाइन पार सेरसा स्टेडियम बाल उद्यान भेजना पड़ता है. लेकिन जब वे खेल कर आते नहीं, भय बना रहता है. बताया कि स्कूल से अाने के बाद बच्चे घर पर टीवी देखते रहते हैं, या फिर सड़क पर ही खेलते हैं.
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