जंगल की गोद से भोजन की थाली तक: बारिश का बेशकीमती स्वाद है रुगड़ा

बाजार में बिक्री के लिये लाया गया रुगड़ा | Prabhat Khabar Network
झारखंड के जंगलों में मिलने वाला रुगड़ा स्वाद और पोषण का खजाना है. जानिए मानसून की इस खास सब्जी की खासियत, कीमत और इसे बनाने की आसान विधि.
खरसावां. झारखंड में मानसून की पहली बारिश सिर्फ खेतों में हरियाली ही नहीं लाती, बल्कि जंगलों की मिट्टी से एक ऐसी प्राकृतिक सौगात भी निकलती है, जिसका इंतजार पूरे साल किया जाता है. यह है रुगड़ा. स्थानीय भाषा में पुट्टू या रुटका के नाम से प्रसिद्ध यह जंगली मशरूम स्वाद, पौष्टिकता और बाजार में ऊंची कीमत के कारण इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है. सरायकेला-खरसावां, पश्चिमी सिंहभूम, खूंटी, तमाड़ आदि के के जंगलों में सुबह होते ही ग्रामीण टोकरी लेकर रुगड़ा की तलाश में निकल पड़ते हैं. कुछ ही सप्ताह तक मिलने वाला यह वन उत्पाद अब झारखंड की पहचान बन चुका है.
जंगल से बाजार तक, आय का भी बन रहा सहारा
रुगड़ा की उपलब्धता सीमित समय तक के लिये होने के कारण इसकी मांग हमेशा अधिक रहती है. ग्रामीण सुबह-सुबह जंगलों में रुगड़ा की तलाश में निकल पड़ते हैं. जंगलों से चुनकर लाए गए रुगड़ा को ग्रामीण स्थानीय हाट-बाजारों में बेचते हैं. सीमित उपलब्धता के कारण इसकी कीमत 600 से 800 रुपये प्रति किलो है, जबकि कई बार इससे भी अधिक पहुंच जाती है. इससे ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त आय का अच्छा स्रोत मिलता है. शहरों के लोग भी इसकी खरीदारी के लिए हाटों का रुख करते हैं.
स्वाद ऐसा कि मटन भी लगे फीका
खाद्य प्रेमियों के बीच रुगड़ा की सबसे बड़ी पहचान इसका अनोखा स्वाद है. पारंपरिक मसालों और सरसों के तेल में बनी रुगड़ा की सब्जी का स्वाद मटन जैसा माना जाता है. यही कारण है कि शाकाहारी होने के बावजूद इसे झारखंड के सबसे स्वादिष्ट व्यंजनों में गिना जाता है. बारिश शुरू होते ही लोग इसकी पहली खेप का बेसब्री से इंतजार करते हैं. अब तो रुगड़ा की सब्जी बड़े बड़े होटल व रेस्टोरेंट की मिनू में भी शामिल हो गयी है.
पोषण का भी है खजाना
विशेषज्ञों के अनुसार रुगड़ा प्रोटीन, फाइबर, खनिज और कई आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर होता है. प्राकृतिक रूप से जंगलों में उगने के कारण इसमें किसी प्रकार के रासायनिक उर्वरक या कीटनाशक का उपयोग नहीं होता. इसे अधिक देर तक पकाने के बजाय मध्यम आंच पर तैयार करने से इसका प्राकृतिक स्वाद और खुशबू बनी रहती है. स्थानीय हाटों से लेकर बड़े शहरों तक इसकी मांग लगातार बढ़ रही है.
ऐसे बनती है स्वादिष्ट रुगड़ा की सब्जी
रुगड़ा को पहले अच्छी तरह धोकर मिट्टी साफ की जाती है. इसके बाद सरसों के तेल में तेजपत्ता, लौंग, दालचीनी और बड़ी इलायची का तड़का लगाया जाता है. प्याज, अदरक-लहसुन, हल्दी, मिर्च, धनिया, जीरा और टमाटर के मसाले में रुगड़ा डालकर धीमी आंच पर 10 से 15 मिनट तक पकाया जाता है. अंत में गरम मसाला और हरा धनिया डालने से इसका स्वाद और बढ़ जाता है. रुगड़ा को अधिक देर तक नहीं पकाना चाहिए, क्योंकि इससे इसकी प्राकृतिक खुशबू और मुलायम बनावट प्रभावित हो जाती है. रुगड़ा केवल एक मौसमी सब्जी नहीं, बल्कि झारखंड की पारंपरिक खान-पान संस्कृति, वन संपदा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की पहचान बन चुका है. बारिश का मौसम आते ही इसकी खुशबू और स्वाद लोगों को जंगल और मिट्टी से जुड़े अपने पुराने रिश्ते का एहसास करा देते हैं.
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लेखक के बारे में
By Sachindra Dash
शचिंद्र कुमार दाश प्रभात खबर के वरीय संवाददाता हैं और हिंदी पत्रकारिता में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखते हैं। वे झारखंड और ओडिशा की राजनीति, प्रशासन, ग्रामीण विकास, सामाजिक सरोकार, कानून-व्यवस्था तथा जनहित से जुड़े मुद्दों की रिपोर्टिंग करते हैं। इसके साथ ही कला, भाषा, संस्कृति, आध्यात्म और समसामयिक विषयों पर लेखन में उनकी विशेष रुचि है। नई जानकारियां जुटाना और उन्हें प्रमाणिक तथ्यों के साथ पाठकों तक पहुंचाना उनकी कार्यशैली की प्रमुख विशेषता है। उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, शिक्षा, खेल, पर्यावरण, साहित्य, संस्कृति से जुड़े विषयों को समेटती है। शचिंद्र कुमार दाश ग्राउंड रिपोर्टिंग पर विशेष जोर देते हैं। वे घटनास्थल पर पहुंचकर तथ्यों के आधार पर समाचार प्रस्तुत करने तथा आम लोगों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने का प्रयास करते हैं।
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