23 सितंबर को खरसावां के दितसाही में होगा इंद्रोत्सव, खेतों में गाड़े जायेंगे ‘इंद डांग’, जानें क्या है मान्यता

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खरसावां के दितसाही में इंद थागा गाड़ते ग्रामीण

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खरसावां के दितसाही में 23 सितंबर को इंद्रोत्सव का आयोजन होगा. अच्छी फसल और क्षेत्र की खुशहाली के लिए 25-30 फीट ऊंचा इंद्र छाता गाड़कर देवराज इंद्र की विशेष पूजा की जाएगी.

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खरसावां: अच्छी फसल और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना को लेकर बुधवार, 23 सितंबर को खरसावां के दितसाही में पारंपरिक इंद्रोत्सव का आयोजन किया जायेगा. देवराज इंद्र की आराधना से जुड़े इस पर्व की तैयारियां पूरी कर ली गयी हैं. राजा-रजवाड़े के समय से चली आ रही इंद्रोत्सव की परंपरा आज भी दितसाही में कायम है. पूरे कोल्हान में खरसावां के दितसाही में ही इस तरह के इंद्रोत्सव के आयोजन की परंपरा होने की बात बतायी जाती है.

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25 से 30 फीट ऊंचा इंद्र छाता गाड़कर होगी पूजा

23 सितंबर की शाम पांच बजे दितसाही स्थित इंद मैदान में पारंपरिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जायेगी. इसके बाद मैदान में करीब 25 से 30 फीट ऊंचा पारंपरिक इंद्र छाता गाड़ा जायेगा. इंद्रोत्सव को देवराज इंद्र की आराधना के पर्व के रूप में मनाया जाता है. स्थानीय मान्यता है कि पूजा से अच्छी बारिश, बेहतर फसल और क्षेत्र में सुख-समृद्धि बनी रहती है.

खरसावां रियासत के समय से जुड़ा है इतिहास

दितसाही के इंद्रोत्सव का इतिहास खरसावां रियासत के समय से जुड़ा हुआ है. देश की आजादी से पहले पूजा के आयोजन और खर्च की व्यवस्था खरसावां के राजा की ओर से की जाती थी. वर्ष 1947 में खरसावां रियासत के भारत गणराज्य में विलय के दौरान तत्कालीन राजा श्रीराम चंद्र सिंहदेव ने बिहार सरकार के साथ मर्जर एग्रीमेंट किया था. इसमें खरसावां के 13 धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन की जिम्मेदारी सरकार को सौंपे जाने का उल्लेख है. इनमें दितसाही का वार्षिक इंद्रोत्सव भी शामिल था. इसके बाद से पूजा के आयोजन के लिए सरकार की ओर से राशि उपलब्ध करायी जाती है. वर्तमान में खरसावां अंचल कार्यालय के माध्यम से पूजा का खर्च दिया जाता है.

खेतों में इंद डांग गाड़ने की भी है परंपरा

इंद्रोत्सव के अवसर पर खेतों में इंद डांग गाड़ने की भी परंपरा है. किसान करम की डाली खेतों में गाड़ते हैं. स्थानीय मान्यता के अनुसार, इससे फसलों को कीटों से बचाने में मदद मिलती है. यह परंपरा कृषि और प्रकृति से जुड़े ग्रामीण विश्वासों को दर्शाती है.

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है पर्व

बदलते समय के बावजूद दितसाही का इंद्रोत्सव खरसावां की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के रूप में कायम है. पारंपरिक तरीके से सादगी के साथ आयोजित होने वाला यह पर्व ग्रामीणों को अपनी पुरानी परंपराओं से जोड़ता है. इंद्रोत्सव के माध्यम से अच्छी फसल, प्रकृति और क्षेत्र की खुशहाली की कामना की जाती है.

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