महामारी से मुक्ति की कथा से जन्मा धूपची मेला 18 को, 246 वर्षों से जारी है परंपरा

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महामारी से मुक्ति की कथा से जन्मा धूपची मेला 18 को, 246 वर्षों से जारी है परंपरा

लकड़ी की से बनी सामग्रियों की खरीदारी के लिए साल भर लोगों को रहता है इंतजार, 40-50 लाख रुपये के कारोबार की उम्मीद

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बरहरवा. प्रखंड क्षेत्र की बटाइल पंचायत अंतर्गत भीमपाड़ा में प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के बाद पहले रविवार को सूर्योपासना का पर्व धूपची मेला का आयोजन धूमधाम के साथ किया जाता है. इस वर्ष पर्व 18 जनवरी (रविवार) को मनाया जायेगा. इसे लेकर मेला आयोजन समिति की ओर तैयारियां पूरी कर ली गयी है. समिति के अध्यक्ष देवाशीष सिंह ने बताया कि भीमपाड़ा में मेला का आयोजन लगभग 246 वर्षों से किया जा रहा है. मेले की ऐतिहासिता के बारे में उन्होंने बताया कि जब क्षेत्र में महामारी का प्रकोप था, तब लोग गांव छोड़ कर पलायन करने लगे थे. ऐसा देखकर गांव के पूर्वजों ने महामारी से बचाव के लिये अपने-अपने देवी देवताओं की पूजा अर्चना शुरू कर दी. इसी दौरान गांव की ही दिवंगत गौतमी देवी को सपना आया कि उनके घर के पीछे विशाल वटवृक्ष के नीचे मिट्टी में दबी शीला पर भगवान सूर्य की उपासना करते हुये जलार्पण करने से महामारी खत्म हो जायेगी. इसके बाद गौतमी देवी तथा गांव वालों के द्वारा सूर्य देव की उपासना करने पर महामारी खत्म हो गयी. इसके बाद से ही यहां पर सूर्य देव की पूजा-अर्चना की जाने लगी. अब यहां प्रत्येक साल एक दिवसीय मेला लगाया जाता है. जिसमें लकड़ी, लोहे और पत्थर से बनी तरह-तरह की सामग्रियों की जमकर खरीद-बिक्री की जाती है. साथ ही मेले में झूले-खिलौने, मिठाई, श्रृंगार आदि की दुकानें सजी रहती है. अध्यक्ष ने बताया कि इस वर्ष मेले में करीब 40-50 लाख रुपये के कारोबार की उम्मीद है. भीमपाड़ा में लगने वाला मेला क्षेत्र की हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है. इस वर्ष मेले के लिए बनी समिति में अध्यक्ष देवाशीष सिंह, उपाध्यक्ष सनीफ शेख, सचिव रासबिहारी दास, उप सचिव इस्माइल शेख, मुस्तफा शेख, कोषाध्यक्ष पप्पू भगत, सह कोषाध्यक्ष नाबिद शेख, संचालक शिवकुमार साहा, विश्वजीत सिंह, सुमित कर्मकार, रोकिब शेख, रेकाबुल शेख आदि के द्वारा मेले के सफल आयोजन को लेकर तैयारियां की जा रही है. मेले में बंगाल से लायी जाती है लकड़ी से बनी सामग्रियां धूपची मेला के पूर्व मकर संक्रांति से ही मेले में लकड़ी और लोहे के सामानों की बिक्री के लिये पश्चिम बंगाल के धुलियान, कालियाचक, फरक्का, डाक बंगला, करेला आदि स्थानों से कारीगर लकड़ी के बने सामानों और कच्चा माल के साथ पहुंचने लगते हैं. गुरुवार को मेले में लकड़ी के पलंग, चौकी, दरवाजा, डाइनिंग टेबल, मेज, कुर्सी, आलना, पीढ़ा सहित अन्य लकड़ी की फर्नीचर और खिलौने बनाने में कारीगर जुटे नजर आये. लकड़ी की वस्तुओं के आलावा मेले में तलवार, दाव, कुल्हाड़ी, हथौड़ा, कुदाल सहित अन्य घरेलू उपयोग की वस्तुएं तथा फर्नीचर लाये जाते हैं. साथ ही मेले में पत्थर के शिलपट्ट, जाता आदि की बिक्री होती है. मेले में मिठाई की होती है खूब बिक्री प्रत्येक वर्ष मेले में आये हजारों लोगों द्वारा जमकर खरीदारी की जाती है. इस दौरान मेला परिसर में लगे दर्जनों मिठाई दुकानों में जलेबी, रसगुल्ला, लौंगलता, ख़ुरमा, बताशा, बालूशाही आदि की बिक्री भारी मात्रा में होती है. वहीं, जलेबी लोग मेले में चाव से खाते हैं और घर भी ले जाते हैं.

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Abdhesh Singh

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