जमीनी हकीकत
:::: रांची में खेल मैदानों का व्यावसायिक दोहन, खिलाड़ियों के सामने अभ्यास का संकट
:::: रांची के ज्यादातर खेल के मैदानों का किया जा रहा है व्यावसायिक इस्तेमाल
रांची. एक दौर था जब रांची शहर के हर मोहल्ले, हर बस्ती में एक खुला मैदान हुआ करता था. बच्चे जहां स्कूल के बाद सीधा मैदान की ओर दौड़ लगाते थे, वहीं युवा वर्ग की शाम क्रिकेट, फुटबॉल, कबड्डी जैसे खेलों के साथ बीतती थीं. लेकिन, आज हालात बिल्कुल बदल गये हैं. जहां कभी चौके-छक्के गूंजते थे, वहां अब बहुमंजिली इमारतें और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बन गये हैं. ‘खेलो इंडिया’, ‘फिट इंडिया’ और ‘खेलो झारखंड’ जैसी सरकारी योजनाएं युवाओं को खेल के प्रति प्रोत्साहित करने का दावा करती है. लेकिन, जब जमीनी हकीकत कुछ और ही है. राजधानी रांची में खेल की बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी दिखाई देती है. यहां बच्चों के खेलने के लिए मैदान तक नहीं हैं. ऐसे में खिलाड़ियों के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राज्य का प्रतिनिधित्व के बारे सोचना बेमानी होगी. आज राजधानी के ज्यादातर मैदानों का व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा है. नतीजतन कभी गलियों और मैदानों में गुंजनेवाली बच्चों की खिलखिलाहट अब मोबाइल स्क्रीन के पीछे कैद होती जा रही है.मोरहाबादी आर्चरी मैदान
30 साल पहले बिरसा मुंडा फुटबॉल मैदान के निर्माण के वक्त बगल में एक और मैदान बना था. शुरू में यहां साई द्वारा तीरंदाजी का अभ्यास और प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती थीं. इससे इसका नाम आर्चरी मैदान पड़ा. अब चारों तरफ से घेर कर इसे पार्क बना दिया गया है, जहां तीरंदाज अभ्यास करते हैं. उस मैदान में कभी छोटे-छोटे बच्चों का जमावड़ा होता था. अब सभाओं, प्रदर्शनियों और निजी आयोजनों का स्थल बन गया है.गोस्सनर मैदान
जीइएल चर्च कॉम्प्लेक्स के पीछे जहां बच्चे क्रिकेट खेलते थे. ये जगह अब खेलने लायक नहीं रहा. यहां बड़ी-बड़ी गगनचुंबी इमारतें बन गयी हैं. जो थोड़ी सी जमीन बची है, वहां बड़ी-बड़ी झाड़ियां उग आयी हैं. यही हाल हरमू मैदान, बिरसा चौक मैदान, हटिया और डोरंडा के कई स्थानों का है.जयपाल सिंह स्टेडियम
जयपाल सिंह स्टेडियम जहां कभी कबड्डी, खो-खो, फुटबॉल के अलावा और भी कई प्रतियोगिताओं का आयोजन होता था, जो अब नहीं होता. अब वहां पार्क बनाकर कमाई का जरिया बना दिया गया है. नामकुम और कोकर इलाके में स्थित छोटे मैदान अब आवासीय कॉलोनियों की भेंट चढ़ चुके हैं. बरियातू का मैदान, जो कभी बच्चों के क्रिकेट का केंद्र था, अब पार्किंग स्थल बन गया है.ऑक्सीजन पार्क
यहां कभी सुबह से लेकर शाम तक खिलाड़ियों को जमावड़ा लगा रहता था, वहां आज खिलाड़ी तो होते हैं, लेकिन गिने-चुने. मैदान में एक-दो कमरे का भवन भी था, जिसमें खेल सामाग्री रखी जाती थी, उसे भी हटा दिया गया है. वहां क्रिकेट क्लब की गतिविधियां भी होती थीं, वहां आज पार्क बन चुका है.
केंद्र सरकार ने मांगा मैदान का ब्योरा
केंद्रीय खेल मंत्रालय ने खेल विभाग से राज्य में खेल मैदान का ब्योरा मांगा है. बताया गया कि केंद्र ने मैदान के अलावा खेल की स्थिति का भी लेखा-जोखा उपलब्ध कराने को कहा है. इस आधार पर खेल विभाग ने राज्य के सभी जिलों से रिपोर्ट मांगी है. अब तक 21 जिलों ने रिपोर्ट भेज दी है.
ब्योरा में क्या-क्या मांगे गये हैं
– कम्यूनिटी ग्राउंड तैयार है या नहीं, अगर है तो युवाओं के लिए उपलब्ध है या नहीं?
– खेलो इंडिया का आधारभूत संरचना है या नहीं?– प्रखंडों से एथलेटिक्स का प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है या नहीं?
राज्य में प्रतिभाओं की कमी नहीं
राज्य में प्रतिभाओं की कमी नहीं है. यहां के युवाओं ने क्रिकेट, हॉकी, तीरंदाजी, बॉक्सिंग, एथलेटिक्स में देश भर में नाम कमाया है. झारखंड की बेटी दीपिका कुमारी आज विश्व स्तर की तीरंदाज हैं. महेंद्र सिंह धौनी ने भी मोरहाबादी जैसे मैदानों से ही अपने क्रिकेट की शुरुआत की थी. लेकिन, आज वैसी सुविधा और स्थान नये खिलाड़ियों को नहीं मिल पा रही है.कागजों तक सीमित रह जाते हैं नियम
भूमि का व्यावसायीकरण और शहरीकरण की बेतरतीब योजना ने खेल मैदानों को निगल लिया है. रियल एस्टेट कंपनियों को रिहायशी टॉवर बनाने की मंजूरी दी जाती है, लेकिन पार्क या खेल परिसर के लिए न्यूनतम 10% भूमि आरक्षित करने का नियम अक्सर कागजों तक ही सीमित रह जाता है.क्या है समाधान?
स्थानीय स्तर पर मैदानों की पहचान कर संरक्षण.
शहरी योजना में खेल मैदान आरक्षण का सख्त पालनस्कूलों और कॉलेजों के ग्राउंड को शिफ्ट टाइमिंग में सार्वजनिक उपयोग के लिए खोलना.प्रत्येक वार्ड में कम से कम एक मिनी स्पोर्ट्स जोन का निर्माण.
किराये या आयोजन के लिए उपयोग पर समय सीमा तय करना.खेलना है तो मैदान चाहिए…
खेल न केवल शरीर को मजबूत करता है, बल्कि व्यक्तित्व और अनुशासन का निर्माण करता है. झारखंड जैसे राज्य को जहां प्राकृतिक प्रतिभा प्रचुर मात्रा में है, वहां मूलभूत संसाधनों की कमी से खिलाड़ियों के सपनों पर रोक लग रही है. अब बच्चों के पास खेलने का समय है, लेकिन जगह नहीं. डिजिटल युग में बच्चों को स्क्रीन से दूर कर मैदान तक लाना पहले से ही कठिन था, अब खुले स्थान ही नहीं बचे. इस कारण शारीरिक गतिविधियों की कमी, मोटापा, मानसिक तनाव जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

