12 साल के मंथन से बनी संताल समाज की संहिता, लुगुबुरू पर आयी 350 पन्नों की किताब

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को काफी टेबल बुक प्रस्तुत करते लेखक सोमनाथ आर्य | Prabhat Khabar Network

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लुगुबुरू घंटाबाड़ी पर आधारित नई कॉफी-टेबल बुक में संताल समाज की परंपराओं, इतिहास और प्रकृति केंद्रित जीवन दर्शन को पहली बार विस्तार से दर्ज किया गया है।

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रांची: झारखंड की पहचान खनिज और जंगलों के साथ उसकी समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत से भी है. बोकारो जिले का लुगुबुरू घंटाबाड़ी धोरोमगढ़ संताल समाज की आस्था, परंपरा, स्वशासन और प्रकृति केंद्रित जीवन दर्शन का प्रमुख केंद्र है. पीढ़ियों से मौखिक रूप में संरक्षित यहां की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं को पहली बार विस्तृत रूप से पुस्तक में आकार देने का प्रयास किया गया है. करीब 350 पृष्ठों की कॉफी-टेबल बुक 'लुगुबुरू घंटाबाड़ी : संताल आदिवासियों का संविधान' में लुगुबुरू के इतिहास, धार्मिक मान्यताओं, सामाजिक व्यवस्था, लोकविश्वास और प्रकृति के साथ सह अस्तित्व की परंपरा को दस्तावेज के रूप में दर्ज किया गया है. लेखक और प्रकाशक का दावा है कि लुगुबुरू पर केंद्रित यह देश-दुनिया की पहली विस्तृत कॉफी-टेबल बुक है.

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने लिखी है प्रस्तावना

पुस्तक के लेखक पत्रकार और जनजातीय संस्कृति के अध्येता डॉ सोमनाथ आर्य हैं. उन्होंने ढाई वर्षों तक लुगुबुरू की यात्राएं कर मांझी, परगना, जोगमांझी और ग्रामीण बुजुर्गों से संवाद के जरिये मौखिक इतिहास और परंपराओं को समझा. पुस्तक के शोध और दस्तावेजीकरण में फिनलैंड की शोध संस्था सोफ्टा ने तकनीकी एवं अकादमिक सहयोग किया है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है. उन्होंने लुगुबुरू की प्रकृति-केंद्रित जीवन दृष्टि और पारंपरिक ज्ञान की आधुनिक दौर में प्रासंगिकता को रेखांकित किया है. पुस्तक मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को समर्पित है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन समेत कई गणमान्य व्यक्तियों के संदेश भी इसमें शामिल हैं.

क्या है लुगुबुरू का आदि संविधान

संताली परंपरा में बुरु का अर्थ पहाड़ है. मान्यता है कि लुगु बाबा के आह्वान पर संताल समाज के पूर्वज लुगुबुरू में एकत्र हुए और 12 वर्षों तक मंथन के बाद सामाजिक एवं धार्मिक जीवन की संहिता तैयार की. इसके प्रमुख आधार प्रकृति संरक्षण, सामूहिक निर्णय और मौखिक परंपरा रहे हैं. पहाड़ी की चोटी पर स्थित पवित्र गुफा धोरोम दोलान में आज भी लुगु बाबा की पूजा होती है.

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