नेपाल त्रासदी के बाद जीएसआई की चेतावनी- हिमालयी क्षेत्रों में ‘मल्टी-हजार्ड’ मॉनिटरिंग सिस्टम की तत्काल जरूरत

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नेपाल में बाढ़ से तबाही का दृश्य. (इनसेट में) GSI के अतिरिक्त महानिदेशक प्रदीप सिंह.

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Himalaya Multi Hazard Alert: नेपाल त्रासदी के बाद भारत के लिए खतरा. GSI के भू-वैज्ञानिक प्रदीप सिंह ने बताया कि हिमालय में एक छोटी हलचल कैसे महा-आपदा बन जाती है. जानें ग्लेशियर और बाढ़ से बचाव का नया प्लान.

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Himalaya Multi Hazard Alert: नेपाल-तिब्बत सीमा के पास हाल ही में आयी विनाशकारी तबाही ने पूरे हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण और सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिये हैं. 26 अगस्त को लांगटांग लिरुंग में बर्फ और चट्टानों के खिसकने से भोटेकोशी नदी का प्रवाह थम गया, जिससे बनी अस्थायी झील के अचानक फटने से भीषण बाढ़ आ गयी. इस बाढ़ ने 1,300 से अधिक लोगों की जान ले ली. नेपाल के इन्फ्रास्ट्रक्चर को तहस-नहस कर दिया.

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‘अलग-अलग नहीं कर सकते खतरों का आकलन’

इस भयावह आपदा पर भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के अतिरिक्त महानिदेशक प्रदीप सिंह ने चेतावनी जारी कर कहा है कि हिमालयी क्षेत्रों में खतरों का आकलन अब अलग-अलग (In Isolation) नहीं किया जा सकता. ऊंचाई वाले क्षेत्रों की एक छोटी-सी हलचल निचले इलाकों में विनाश (Cascading Disaster) का कारण बन सकती है.

कैसे एक छोटी हलचल बनती है महा-आपदा?

जीएसआई (GSI) के भू-वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्रों में एक आपदा दूसरी आपदा को जन्म देती है. उनका कहना है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान या ढलान के असंतुलन से हिम-स्खलन (Avalanche), भू-स्खलन (Landslide) या ग्लेशियर टूटने की घटना होती है.

खिसकी हुई बर्फ, मलबे और चट्टानों के कारण प्राकृतिक नदियों का प्रवाह अचानक रुक जाता है. अस्थायी झीलें बन जाती हैं. उपग्रह तस्वीरों में नेपाल के लांगटांग में 11 हेक्टेयर में जलजमाव हो गया था.

जब यह पानी का दबाव प्राकृतिक बांधों को तोड़ता है, तो निचले इलाकों में मलबे के साथ भयंकर बाढ़ आती है, जैसा कि अक्टूबर 2023 में सिक्किम त्रासदी (60 से अधिक मौतें) और अब नेपाल में देखा गया.

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केवल सैटेलाइट पर निर्भरता खतरनाक

वैज्ञानिकों का मानना है कि केवल उपग्रह चित्रों (Satellite Imagery) के भरोसे समय रहते सटीक चेतावनी देना संभव नहीं है, क्योंकि ढलान टूटने का सटीक समय तय करना जटिल है. इसके लिए 4-स्तरीय एकीकृत निगरानी ढांचा (Integrated Monitoring Framework) लागू करना होगा. आइए, जानते हैं जीएसआई ने क्या सुझाव दिये हैं.

  1. InSAR डाटा विश्लेषण : समय-समय पर ढलानों में आ रहे सूक्ष्म बदलावों की ट्रैकिंग.
  2. ऑप्टिकल फीचर ट्रैकिंग : उपग्रह तस्वीरों से प्राकृतिक संकेतों और भू-भाग की गति का विश्लेषण.
  3. जमीनी उपकरण (Ground Instrumentation): संवेदनशील पहाड़ियों पर धरातलीय यानी जमीनी सेंसर लगाना.
  4. जमीनी जांच (Field Observation): वैज्ञानिकों द्वारा भौतिक रूप से उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों का नियमित निरीक्षण.

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हिमालयी राज्यों के लिए जीसीआई की मुख्य सिफारिशें

  • जोखिम वाले क्षेत्रों की प्राथमिकता से जांच की जाये. उन संवेदनशील पहाड़ियों और नदियों की पहचान करें, जो आबादी वाले इलाकों के ठीक ऊपर हैं.
  • क्रॉस-बॉर्डर डेटा शेयरिंग की जरूरत है. भारत, नेपाल और भूटान के बीच वास्तविक समय (Real-time) में मौसम और जलस्तर का डेटा साझा करना जरूरी है.
  • स्मार्ट लैंड-यूज प्लानिंग करनी होगी. नदियों के प्राकृतिक प्रवाह और संवेदनशील ढलानों के पास अनियंत्रित निर्माण पर रोक लगना होगा.
  • कम्युनिटी प्रीपेयर्डनेस के तहत निचले इलाकों में रहने वाले नागरिकों को आपदा चेतावनी मिलते ही सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए प्रशिक्षित करना होगा.

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