Ranchi News : रांची निवासी डॉ प्रकाश सहाय ने इंग्लैंड में बनायी अपनी पहचान
Published by : KRANTI Updated At : 03 Dec 2025 6:21 PM
रांची के निवासी डॉ प्रकाश कुमार सहाय ने इंग्लैंड में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनायी है.
रांची निवासी डॉ पीके सहाय ने इंग्लैंड में बनायी अपनी पहचान
::::: रांची के डॉ पीके सहाय वर्ष 1988 से बर्मिंघम, इंग्लैंड में चला रहे हैं अपना क्लिनिक::::: चर्च में किराया का रूम लेकर किए थे शुरुआत, अब अपनी जमीन पर क्लिनिक
लाइफ रिपोर्टर @ रांचीरांची के निवासी डॉ प्रकाश कुमार सहाय ने इंग्लैंड में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनायी है. इसके साथ ही वह वहां भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. डॉ पीके सहाय ने रिम्स, रांची से एमबीबीएस की पढ़ाई की. पढ़ाई पूरी करने के बाद वे इंग्लैंड के बर्मिंघम चले गए. वहीं 1988 में एक चर्च में किराये के कमरे से उन्होंने अपना क्लिनिक शुरू किया. उस समय उनके सामने कई चुनौतियां थीं, लेकिन वे निरंतर कड़ी मेहनत करते रहे. शुरुआत में उनके साथ लगभग 1400 मरीज जुड़े थे. आज उनका क्लिनिक उनकी अपनी संपत्ति पर है और उनके साथ लगभग 6000 मरीज जुड़े हुए हैं. क्लिनिक संचालन में उनके परिवार के सदस्य पत्नी रीता सहाय, बेटी डॉ प्रिया ऋषि और बेटा डॉ राहुल सहाय महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
झारखंड की स्वास्थ्य सेवा में देना चाहते हैं योगदान
डॉ पीके सहाय बिहार-झारखंड मेडिकल एसोसिएशन यूके के पूर्व वाइस-प्रेसीडेंट रह चुके हैं और वर्तमान में पेट्रोन की भूमिका निभा रहे हैं. वे इंडियन मेडिकल एसोसिएशन यूके के संस्थापक सदस्य भी रहे हैं. इसके अलावा वे ब्रिटिश एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडियन ओरिजिन, वेस्ट मिडलैंड्स (यूके) के पूर्व चेयरमैन भी रह चुके हैं. स्थानीय शिक्षा प्राधिकरण बर्मिंघम की ओर से उन्हें एक स्कूल का बोर्ड ऑफ गवर्नर नियुक्त किया गया था, जहां उन्होंने लगभग 20 वर्षों तक सेवा दी. उनका कहना है कि वे अपने देश में, विशेषकर झारखंड की स्वास्थ्य सेवाओं के उत्थान के लिए कार्य करना चाहते हैं.
इंग्लैंड में भारतीय संस्कृति का संवर्धन
डॉ सहाय इंग्लैंड में भारतीय संस्कृति के प्रसार के लिए भी लगातार प्रयासरत हैं. पिछले 30 वर्षों से वे होली, दिवाली सहित अन्य भारतीय त्योहारों का आयोजन करते आ रहे हैं. इन कार्यक्रमों में भारतीय मूल के लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं. वे बच्चों को भारतीय संस्कृति से परिचित कराने का प्रयास करते हैं, ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहे.
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