National Youth Day 2022: झारखंड के ये जिले कभी थे गुमनाम, लेकिन इन युवाओं ने राज्य को दिलायी अलग पहचान

झारखंड के युवाओं ने भी देश दुनिया में डंका बजाया. लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने राज्य को एक अलग पहचान दिलायी. ये युवा उन जगहों से निकलकर आए जो कभी गुमनाम थे
रांची : दुनिया में अध्यात्म और भारतीय संस्कृति का डंका बजानेवाले स्वामी विवेकानंद का आज जन्मोत्सव है. इस दिन को युवा दिवस के रूप में हम मनाते हैं. युवा राष्ट्र की ताकत हैं. बदलाव के वाहक हैं. ये उम्मीद जगाते हैं…झारखंड के युवाओं ने भी देश दुनिया में डंका बजाया. लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने राज्य को एक अलग पहचान दिलायी. ये युवा उन जगहों से निकलकर आए जो कभी गुमनाम हुआ करते थे
हजारीबाग के बड़कागांव के हैं राजीव. दो साल तक इटली और जर्मनी में रहे. लाखों रुपये के पैकेज पर काम किया. इसके बाद अपने गांव आकर खेत-खलिहान में जुट गये. अब खेती-बारी से लाखों कमा रहे हैं. राजीव ने मदुरई के टाटा धान (डेवलपमेंट ऑफ ह्यूमन एक्शन फाउंडेशन) एकेडमी से मैनेजमेंट की पढ़ाई की.
जर्मनी के फेडरल मिनिस्ट्री ऑन इकोनॉमिक ऑपरेशन में काम किया. एक साल इटली की फंडिंग एजेंसी के साथ काम किया. वर्ष 2018 में बड़कागांव आ गये. उत्तरी छोटानागपुर प्रोग्रेसिव फॉर्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड का निबंधन कराया. इस संस्था से 1250 किसान जुड़े हैं. संस्था का टर्नओवर एक करोड़ रुपये से अधिक है.
खूंटी के हेसल गांव में कभी बांस की बनी स्टिक से हॉकी का ककहरा सीखती थीं निक्की प्रधान. आज वह अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हैं. झारखंड की निक्की ने रियो ओलिंपिक में देश का प्रतिनिधित्व किया है. कोच दशरथ बताते हैं कि निक्की के पास हॉकी स्टिक नहीं थी़. इस दौरान वह बांस की स्टिक और बांस की गेंद बनाकर ट्रेनिंग करती थीं.
उन्होंने अपने इंटरनेशनल करियर 2015 में ही शुरू किया था, लेकिन 2016 में दक्षिण अफ्रीका के दौरे में चुने जाने के बाद टीम में अपनी जगह पक्की कर ली. इसके बाद वह भारत के लिए दो-दो ओलिंपिक में खेलनेवाली झारखंड की पहली महिला हॉकी खिलाड़ी बन गयीं. सबसे पहले उन्होंने रियो ओलंपिक में हिस्सा लिया था.
इंडिया टुडे ने नयी नस्ल के 100 नुमाइंदों को समर्पित पांच जनवरी के ताजा अंक में पश्चिमी सिंहभूम की युवा कवियत्री और लेखिका जसिंता केरकेट्टा का नाम शामिल किया है. जसिंता ने 2020 में हार्वर्ड इंडिया कांफ्रेंस में शिरकत की. 2020 में ही पेरिस में लोगों को संबोधित किया. उनकी कविताओं पर यूक्रेन और ऑस्ट्रेलिया के युवा शोधार्थी काम कर रहे हैं.
दो कविता संग्रह ‘अंगोर’ और ‘जड़ों की जमीन’ का जर्मन, इतालवी व फ्रेंच भाषा में अनुवाद हो चुका है. जसिंता को 2014 में एशिया इंडिजिनस पीपुल्स पैक्ट की तरफ से वॉयस ऑफ एशिया का रिकग्निशन अवार्ड मिल चुका है. 2021 में जनकवि मुकुट बिहारी सरोज सम्मान से सम्मानित हुईं.
Posted by : Sameer Oraon
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