National Nutrition Week: पोषण सप्ताह शुरू, जानें कैसे पोषणयुक्त है झारखंड की थाली

Updated at : 02 Sep 2022 9:35 AM (IST)
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National Nutrition Week: पोषण सप्ताह शुरू, जानें कैसे पोषणयुक्त है झारखंड की थाली

स्वास्थ्य विभाग राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मना रहा है. यह सप्ताह प्रत्येक वर्ष एक से 7 सितंबर तक चलाया जाता है. लोगों को जागरूक किया जाता है. बेहतर सेहत के लिए पर्याप्त पोषक तत्व जरूरी हैं. खास बात है कि ये पोषक तत्व झारखंडी थाली में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं तो आइए जानतें है कि झारखंड के थाली में.

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Ranchi news: कोई भी व्यक्ति कुपोषण का शिकार न हो और स्वास्थ्य के लिए जरूरी खान-पान का महत्व समझे, इसी उद्देश्य के साथ स्वास्थ्य विभाग राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मना रहा है. यह सप्ताह प्रत्येक वर्ष एक से 7 सितंबर तक चलाया जाता है. लोगों को जागरूक किया जाता है. बेहतर सेहत के लिए पर्याप्त पोषक तत्व जरूरी हैं. खास बात है कि ये पोषक तत्व झारखंडी थाली में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं.

राज्य में मिलनेवाले मौसमी फल और साग-सब्जियों से शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की कमी दूर होती है. इसमें चाकोर साग, सरला साग, बेंग या ब्रह्मी साग, फुटकल साग, गंधारी साग कैल्शियम, विटामिन, पोटैशियम, फास्फोरस आदि की जरूरत को पूरा करते हैं. ये पोषक तत्व शरीर में हॉर्मोन का स्तर बरकरार रखते हैं. एनिमिया (खून की कमी) की समस्या दूर होती है़ हड्डियां मजबूत होती हैं.

पोषण तत्व से भरपूर हैं झारखंडी साग-सब्जियां

  • सरला साग: इसे मैग्नीशियम में सुपर रिच माना गया है. पाचन शक्ति बढ़ने के साथ गैस की समस्या से निजात मिलती है.

  • चाकोर साग या चक्रमर्द साग: प्रचुर मात्रा में विटामिन-सी, कैल्शियम, आयरन पाया जाता है. इसके सेवन से लिवर की समस्या में तेजी से सुधार होता है. इसके बीज खाने से टीबी जैसी बीमारी ठीक होती है और आंख की रोशनी बढ़ती है.

  • मड़ुआ या रागी: प्रति 100 ग्राम रागी में विटामिन ए-42 माइक्रो, आयरन 3.9 मिग्रा, प्रोटीन 3.7 ग्राम, कैल्शियम 344 मिग्री और कैलोरी 328 पायी जाती है. इसके नियमित सेवन से शरीर की हड्डियां मजबूत होती हैं. एनिमिया पर नियंत्रण होता है. मधुमेह और अतिरिक्त वजन को कम करने में मददगार है. यदि गर्भवती महिलाएं भोजन में मड़ुआ काे शामिल करती हैं, तो दूध में वृद्धि होती है.

  • फुटकल साग: कैल्शियम, आयरन, जिंक और फाइबर से भरपूर है. इस साग में एंटी माइक्रोबियल क्षमता पायी जाती है. शरीर को वायरल बीमारी से सुरक्षा मिलती है़ जिन महिलाओं में यूरिन सिस्टम में इंफेक्शन की समस्या होती है, उनके लिए यह मददगार है. इसके अलावा फूटकल साग से पेट में गैस की समस्या दूर होती है.

  • पालक साग: प्रति 100 ग्राम में पालक साग में विटामिन ए 5580 मिग्रा, विटामिन सी 28 मिग्रा, आयरन 10.9 मिग्रा, प्रोटीन दो मिग्रा, कैल्शियम 73 मिग्रा और 26 कैलोरी पायी जाती है. इसके नियमित सेवन से आंखों की समस्या, खून की कमी दूर होती है.

  • सहजन साग: प्रति 100 ग्राम सहजन साग में विटामिन ए 6780 माइक्रो ग्राम, विटामिन सी 220 माइको ग्राम, आयरन 0.85 मिग्रा, प्रोटीन 6.7 ग्राम, कैल्शियम 440 मिग्रा और 92 फीसदी कैलोरी पायी जाती है. ब्लड प्रेशर से राहत मिलती है.

  • गंधारी साग: गंधारी या चौलाई साग में कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन-ए, मिनरल और आयरन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है. शरीर में विटामिन की कमी को दूर करने के साथ कफ और पित्त के नाश करने में मददगार है.

  • अरहर दाल: झारखंड में अरहर दाल की खेती बहुतायत में होती है. इस दाल में विटामिन सी, विटामिन इ, विटामिन के, बी कॉम्प्लेक्स, पोटैशियम, सोडियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस, जिंक और प्रोटीन की मात्रा होने से शरीर की मेटाबॉलिज्म बढ़ती है.

  • महुआ: यूरियामुक्त महुआ के सेवन से शरीर को काफी फायदा होता है. महिलाओं में दूध की क्षमता बढ़ती है.

  • लाल चावल: सिमडेगा, दुमका और चाईबासा में बहुतायत में लाल चावल की खेती होती है. इस चावल का ग्लेसेमिक इंडेक्स यानी पचने के बाद ग्लूकोज में बदलने की गति धीमी है. ऐसे में इस चावल को मधुमेह रोगी खा सकते हैं.

  • रुगड़ा और खुखड़ी: इसमें प्रोटीन, फैट, फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और कार्बोहाइड्रेट प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. वहीं रुगड़ा से शरीर में कैल्शियम और प्रोटीन की मात्रा बढ़ायी जा सकती है. एनिमिया पीड़ित में तेजी से खून की मात्रा बढ़ती है.

  • बेंग साग या ब्रह्मी: इसमें विटामिन बी, विटामिन सी, प्रोटीन, पाइटो न्यूट्रिशन पाया जाता है. यह पाचन शक्ति बढ़ाने में मददगार है. इसके अलावा जॉन्डिस को ठीक करने, ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने और स्मरण शक्ति को बढ़ाने में सहयोग करता है.

  • संधना या बांस करील: कैल्शियम की मात्रा अत्यधिक होने से हड्डियों को मजबूती मिलती है. संधना में फाइबर, विटामिन बी-6, विटामिन इ,कॉपर की मात्रा अत्यधिक होने से लाभ मिलता है.

  • गोंदली: (एक प्रकार का मड़ुआ) : हृदय रोग को संतुलित करने, मोतियाबिंद को ठीक करने और शरीर में कैंसर सेल को नियंत्रित करने में गोंदली बेहद मददगार है. इसके अलावा गले में खराश और पेट की समस्या से भी राहत मिलती है.

राज्य के फल में पोषण तत्व

आंवला: प्रति 100 ग्राम में 50 ग्राम कैल्शियम, 13.7 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 3.4 ग्राम फाइबर, 20 ग्राम फास्फोरस और 1.2 ग्राम आयरन पाया जाता है. सितंबर से नवंबर के बीच ग्रामीण इलाकों में यह फल पाया जाता है. इसमें फाइबर प्रचुर मात्रा में होती है. लोग इसकी चटनी खाना पसंद करते हैं.

अमड़ा: सूखाग्रस्त क्षेत्र में अमड़ा प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. प्रति 100 ग्राम में 4.5 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, एक ग्राम फाइबर, तीन ग्राम फैट, 0.7 ग्राम प्रोटीन, 11 एमजी फास्फोरस और 3.9 ग्राम आयरन की मात्रा होती है. गले की खराश ठीक होती है.

सीताफल: प्रति 100 ग्राम में 25.2 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 2.4 ग्राम फाइबर, 1.7 ग्राम प्रोटीन, 21 एमजी फास्फोरस और 30 ग्राम कैल्शियम पाया जाता है. शरीफा ट्यूमर को नियंत्रित करने में मददगार है़ इसे पत्ते को पीस कर सिर में लगाने से डैंड्रफ से मुक्ति मिलती है.

मारगी: जून-जुलाई में रांची के आस-पास के गांवों में बहुतायत में मारगी का उत्पादन होता है.

आनी: मई और जून माह तक संताल और पहाड़िया इलाके में यह फल पाया जाता है. इसे कच्चा खाया जाता है और इसके पत्ते जानवरों के लिए पोषणयुक्त चारा हैं.

आरा: मई से जुलाई तक यह फल आस-पास के गांव में आसानी से मिलेगा. अकाल के दौरान ग्रामीण इसे खाकर अपना पेट भरते हैं. प्रति 100 ग्राम में 1.7 ग्राम प्रोटीन, 11.8 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 8.5 ग्राम फाइबर और 43 एमजी फास्फोरस पाया जाता है. यह फल दांत के दर्द को खत्म करता है.

कुदरूम: सितंबर से नवंबर के बीच ग्रामीण इलाकों में यह फल पाया जाता है. इसमें फाइबर प्रचुर मात्रा में होती है. लोग इसकी चटनी खाना पसंद करते हैं.

जंक फूड बच्चों और युवाओं को बना रहा बीमार

शहर के चौक-चौराहों पर आसानी से मिलनेवाला फास्ट फूड युवाओें और बच्चों को बीमार बना रहा है. छोटे बच्चों को जंक फूड पीजा, बर्गर, चिप्स व सॉफ्ट ड्रिंक की आदत हो गयी है. इस कारण युवा और बच्चे हार्ट, पेट की बीमारी और मोटापा की चपेट में आ रहे हैं. रिम्स के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ एके वर्मा ने बताया कि बच्चों में मोटापे के कारण शुगर और बीपी की समस्या आ रही है. प्रत्येक सप्ताह के ओपीडी में दो-तीन ऐसे बच्चों को परामर्श देते हैं. अभिभावकों को जागरूक किया जाता है कि वह बच्चों को जंक फूड की जगह पौष्टिक युक्त भोजन को दें. टिफिन में जंक फूड देने से परहेज करें. मेडिसिन के विभागाध्यक्ष डॉ विद्यापति ने बताया कि जंक फूड को स्वादिष्ट बनाने के लिए नमक का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. स्वाद तो बढ़ जाता है, लेकिन यह बीमार भी बनाता है. कम उम्र में शुगर, हार्ट और किडनी की बीमारी होती है.

आइसीएमआर ने चेताया है

आइसीएमआर ने लाइफ स्टाइल डिजीज पर चिंता जाहिर की है. देश की वर्तमान स्थिति का आकलन करते हुए आगाह किया गया है कि जंक फूड में नमक, चीनी और वसा की मात्रा काफी ज्यादा होती है. यही समस्या का बड़ा कारण बनता है. जंक फूड खाने से शरीर का मेटाबॉलिज्म धीरे-धीरे असंतुलित हो जाता है.

एक्सपर्ट कहते हैं

आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. वीके पांडेय ने कहा कि आयुर्वेद में जंक फूड की जगह पारंपरिक भोजन की सलाह दी जाती है. झारखंड में साग का भंडार है, जो शरीर को कई बीमारी से बचाता है. बच्चों को साग, सब्जी और फल दें. इससे बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होंगे.

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