9 डिग्रियों वाले झारखंड के 'काले हीरे' की कहानी, लंदन की नौकरी छोड़ भारत आकर बसे फिर बने आदिवासियों की आवाज

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कार्तिक उरांव की फाइल फोटो

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जानें बाबा कार्तिक उरांव की अविश्वसनीय यात्रा, जिन्होंने 9 डिग्रियां हासिल कीं और लंदन की आरामदायक जिंदगी छोड़कर भारत लौट आए. उन्होंने देश के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के डिजाइन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आदिवासियों के हक की आवाज बने.

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रांची : आज के समय में जहां लोग विदेश में एक बार अच्छी नौकरी या पैकेज पाकर वहीं बस जाने का सपना देखते हैं, वहीं भारत के इतिहास में एक ऐसा आदिवासी वैज्ञानिक और इंजीनियर हुआ, जिसने ब्रिटेन (UK) में अपनी अच्छी खासी नौकरी को छोड़कर भारत आए और अपनी माटी का सेवा करने का फैसला किया. एक ऐसी शख्सियत जिसने दुनिया के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा केंद्र का मुख्य डिजाइन तैयार किया. उनके पास 9-9 डिग्रियां हासिल थीं, लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरू के सिर्फ एक आग्रह पर सब कुछ छोड़कर भारत लौट आया. हम बात कर रहे हैं झारखंड (तत्कालीन बिहार) के गुमला जिले से निकलकर विश्व पटल पर भारत का नाम रोशन करने वाले बाबा कार्तिक उरांव की. लंदन में शानदार सैलरी, लग्जरी लाइफ और सम्मान की जिंदगी छोड़ जब वे भारत लौटे, तो उन्होंने सिर्फ HEC (हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन), रांची में देश की बुनियाद ही नहीं गढ़ी, बल्कि 3 बार सांसद बनकर आदिवासियों और शोषितों के हक की सबसे बुलंद आवाज भी बने.

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पटना से लंदन तक का कैसे किया सफर

गुमला के एक साधारण उरांव (आदिवासी) परिवार में जन्मे कार्तिक उरांव बचपन से ही असधारण प्रतिभा के धनी थे. उन्होंने न केवल भारत के प्रतिष्ठित संस्थानों से शिक्षा ली, बल्कि स्कॉटलैंड और इंग्लैंड के शीर्ष तकनीकी संस्थानों से डिग्रियां प्राप्त कर एक कीर्तिमान स्थापित किया.

क्रमडिग्री / डिप्लोमा / सदस्यताविषय / क्षेत्रसंस्थान / देश
1B.SC. Engineeringसिविल इंजीनियरिंगबिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (NIT Patna), भारत
2D.R.C.S.T.स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंगरॉयल कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, स्कॉटलैंड
3D.I.C.एडवांस स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंगइंपीरियल कॉलेज ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, लंदन (UK)
4A.M.I.E. (India)चार्टर्ड इंजीनियरिंगद इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स, भारत
5M.I.E. (India)पूर्ण चार्टर्ड सदस्यताद इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स, भारत
6A.M.I.E. (London)एसोसिएट मेंबरइंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स, लंदन
7M.I.Struct.E. (London)स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग फेलोशिपइंस्टीट्यूशन ऑफ स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स, लंदन
8M.I.C.E. (London)सिविल इंजीनियरिंग फेलोशिपइंस्टीट्यूशन ऑफ सिविल इंजीनियर्स, लंदन
9Advance Research Certificateन्यूक्लियर प्लांट डिजाइनब्रिटेन न्यूक्लियर पावर रिसर्च सेंटर

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नेहरू से वह ऐतिहासिक मुलाकात, जिसने बदल दी कार्तिक उरांव की जिंदगी

1950 के दशक में कार्तिक उरांव यूके (ब्रिटेन) में रह रहे थे. 1959 के आसपास उन्होंने ब्रिटेन के सबसे बड़े स्वचालित परमाणु स्टेशन- 'हिंकले पॉइंट न्यूक्लियर पावर प्लांट' (Hinkley Point Nuclear Power Station) का मुख्य स्ट्रक्चरल डिजाइन तैयार किया था. उनके इस कारनामे की गूंज पूरे यूरोप में थी. 1958-59 के दौरान जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू लंदन के दौरे पर गए, तो उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों से उनकी प्रतिभा के बारे में पता चला. इसके बाद पंडित नेहरू ने खुद कार्तिक उरांव से मुलाकात की थी. उस मुलाकात के दौरान पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कार्तिक उरांव के कंधों पर हाथ रखकर कहा "कार्तिक'', ब्रिटेन को आपकी काबिलियत की उतनी जरूरत नहीं है, जितनी आज के स्वतंत्र भारत को है. हम रांची में 'हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन' (HEC) के रूप में देश के भारी उद्योग की नींव रख रहे हैं. भारत को आपके जैसे दूरदर्शी और विद्वान इंजीनियरों की सख्त जरूरत है. देश लौटिए और अपनी मातृभूमि के निर्माण में अपना योगदान दीजिए. जवाहर लाल नेहरू के इन शब्दों ने कार्तिक उरांव के दिल को छू लिया. उन्होंने बिना एक पल गंवाए ब्रिटेन की आलीशान नौकरी, बड़ा सैलरी पैकेज और सुविधाएं छोड़ने का फैसला कर लिया. मई 1961 में वे वतन वापस लौट आए.

HEC रांची के डिप्टी चीफ इंजीनियर से संसद भवन तक का सफर

भारत लौटने के बाद वे रांची में बने HEC (हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन) में सुपरिंटेंडेंट कंस्ट्रक्शन डिजाइनर और डिप्टी चीफ इंजीनियर के पद पर नियुक्त हुए. HEC को उस समय "सभी उद्योगों की जननी" कहा जाता था और इसके शुरुआती निर्माण व लेआउट में कार्तिक उरांव की तकनीकी कुशलता का बहुत बड़ा योगदान था. हालांकि, HEC में काम करते हुए उन्होंने देखा कि छोटानागपुर के आदिवासियों और मूलवासियों की स्थिति बेहद दयनीय है. उनकी जमीनें ली जा रही थीं, लेकिन उन्हें उनका वाजिब हक नहीं मिल रहा था. इसके बाद उन्होंने इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़कर जनसेवा की राह चुनी.

कैसे रखा राजनीति में कदम

1962 में उन्होंने लोहरदगा लोकसभा सीट से पहला चुनाव लड़ा, लेकिन वे बहुत कम वोटों से चुनाव हार गए. इसके बाद वे 1967, 1971 और 1980 के लोकसभा चुनावों में लोहरदगा सीट से लगातार 3 बार सांसद (MP) चुने गए. अपनी विद्वता के कारण वे इंदिरा गांधी की सरकार में नागरिक उड्डयन एवं संचार राज्य मंत्री बने. उन्होंने अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद (1968) नामक संगठन की नींव रखी. इसका उद्देश्य अपने समुदाय को एकजुट रखना और उनके हक के लिए आवाज उठाना था. इसके अलावा संसद में 'डी-लिस्टिंग' (De-listing) का ऐतिहासिक मुद्दा उठाया, हालांकि ये बिल पारित नहीं हो सका. 8 दिसंबर 1981 को नई दिल्ली में संसद सत्र के दौरान ही अचानक दिल का दौरा पड़ने से इस महान जननायक का निधन हो गया. लेकिन 'छोटा नागपुर के काले हीरे' और 'बाबा कार्तिक उरांव' के नाम से मशहूर इस महापुरुष की गाथा आज भी झारखंड के हर आदिवासी युवा के लिए प्रेरणा का स्रोत है.

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