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झारखंड की पुलिस नशे के कारोबारियों को सजा दिलाने में हो जाती है फेल, जानें कहां पड़ रही कमजोर

Updated at : 05 Apr 2024 11:42 AM (IST)
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झारखंड पुलिस

फाइल फोटो

एनडीपीएस एक्ट व उत्पाद अधिनियम से जुड़े ज्यादातर मामलों में पुलिस अपनी सूचना के आधार पर छापेमारी और केस दर्ज करती है. ऐसे मामलों में अधिकांश गवाह भी पुलिस के ही होते हैं.

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रांची : झारखंड में पुलिस नशे के कारोबारियों को गिरफ्तार कर जेल भेजती है. साथ ही चार्जशीट भी कर देती है, लेकिन अदालत में ट्रायल के दौरान आरोपियों को सजा दिलाने में फेल हो जाती है. संबंधित केसों के ट्रायल के बाद आनेवाले फैसलों के आंकड़े इस तथ्य की पुष्टि करते हैं. वर्ष 2022 में मादक द्रव्य पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस एक्ट) के तहत दर्ज कुल 200, जबकि उत्पाद अधिनियम के तहत दर्ज 124 केसों का ट्रायल पूरा हुआ था.

एनडीपीएस एक्ट से जुड़े केस में सजा की दर सिर्फ 47-50 प्रतिशत रही. वहीं, उत्पाद अधिनियम में सजा की दर 12.90 प्रतिशत रही. इन केसों में सबसे अधिक लोग ‘साक्ष्य के अभाव में’ बरी कर दिये गये. यानी उक्त केसों के अनुसंधान के दौरान पुलिस ने आरोपियों को सजा दिलाने लायक सुबूत इकट्ठा नहीं किये थे.

यह है पुलिस की कमजोर कड़ी :

सबसे अहम बात यह है कि एनडीपीएस एक्ट व उत्पाद अधिनियम से जुड़े ज्यादातर मामलों में झारखंड पुलिस अपनी सूचना के आधार पर छापेमारी और केस दर्ज करती है. ऐसे मामलों में अधिकांश गवाह भी पुलिस के ही होते हैं. हैरानी की बात यह है कि एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज नौ मामले अदालत में ट्रायल के दौरान गवाहों के मुकरने (हॉस्टाइल होने) की वजह से फेल हो गये.

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रिहा हो गया आरोपी :

लोअर बाजार पुलिस ने 17 जनवरी 2014 को मो सोनू को गिरफ्तार किया था. पुलिस ने उसके पास 52 पुड़िया ब्राउन शुगर होने का केस दर्ज किया था. इस केस में ट्रायल के दौरान गिरफ्तारी का गवाह मुकर गया. अन्य गवाहों ने भी प्रॉसिक्यूशन की स्टोरी का समर्थन नहीं किया. वहीं, केस में अनुसंधानक और केस दर्ज करानेवाले पुलिस अफसर की गवाही तक नहीं करायी गयी. इस कारण 10 फरवरी 2023 को न्यायालय ने आरोपी को बरी कर दिया.

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