झारखंड में खजाना फुल, पर विकास की चाल सुस्त, 1.42 लाख करोड़ के बजट में 4 महीने में खर्च हुए सिर्फ 23%

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1.42 लाख करोड़ के बजट का मात्र 23 फीसदी हुआ खर्च, Pic Credit- AI, Only for Symbolism

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झारखंड में सरकारी खजाने में पैसों की कमी नहीं, पर विकास योजनाओं का पहिया थमा हुआ है. 1.42 लाख करोड़ के बजट का सिर्फ 23.87% खर्च हुआ है. जानिए क्यों फाइलों के बोझ और प्रशासनिक सुस्ती के कारण राज्य का विकास धीमा है.

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रांची : झारखंड के सरकारी खजाने में विकास योजनाओं के लिए धन की कोई कमी नहीं है, लेकिन फाइलों के बोझ, टेंडर प्रक्रिया में लचर रवैये और प्रशासनिक सुस्ती के कारण राज्य के विकास की रफ्तार थमी हुई नजर आ रही है. वित्तीय वर्ष 2026-27 के पहले चार महीने बीत जाने के बाद भी 1,42,019.37 करोड़ रुपये के कुल बजट का महज 23.87 प्रतिशत (33,897.27 करोड़ रुपये) ही धरातल पर खर्च हो पाया है. हैरान करने वाली बात यह है कि विभिन्न स्तरों पर 88,427.86 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की जा चुकी है और इसमें से 62,677.27 करोड़ रुपये ड्राइंग एंड डिसबर्सिंग ऑफिसर (डीडीओ) को आवंटित भी कर दिए गए हैं.

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कोषागार से निकासी और धरातल पर खर्च में 23,296 करोड़ का अंतर

आंकड़ों के बारीक विश्लेषण से प्रशासनिक तंत्र की बड़ी खामी उजागर होती है. राज्य के कोषागार (ट्रेजरी) से 57,192.98 करोड़ रुपये की निकासी की जा चुकी है, लेकिन धरातल पर वास्तविक खर्च का आंकड़ा 34 हजार करोड़ रुपये से भी नीचे है. साफ है कि कोषागार से निकली राशि और अंतिम भुगतान के बीच करीब 23,296 करोड़ रुपये का एक बड़ा अंतर बना हुआ है. यानी ट्रेजरी से निकाली गई राशि का एक बड़ा हिस्सा अभी तक वास्तविक भुगतानों या अंतिम रूप से काम करने वाली एजेंसियों के खातों में तब्दील नहीं हो सका है.

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हर साल की तरह इस बार भी वही कहानी

राज्य में वित्तीय वर्ष के शुरुआती महीनों में बजट खर्च की गति बेहद धीमी रहने का ढर्रा वर्षों से चला आ रहा है. वित्त एवं वाणिज्य कर विभाग के सेवानिवृत्त संयुक्त आयुक्त गोपाल कृष्ण तिवारी बताते हैं कि शुरुआती महीनों में सुस्त चाल के कारण वर्ष के अंतिम दौर में विभागों पर बजट निपटाने का भारी दबाव बन जाता है. इससे न केवल परियोजनाओं की समय-सीमा बढ़ती है, बल्कि जल्दबाजी में काम की गुणवत्ता प्रभावित होने का गंभीर खतरा भी पैदा हो जाता है.

वित्तीय वर्षअगस्त तक व्यय की स्थितिस्थिति का विश्लेषण
2022-23लगभग 17-18%शुरुआती महीनों में बेहद धीमी शुरुआत
2023-24लगभग 18-19%अगस्त के बाद खर्च में आई थी थोड़ी तेजी
2024-25लगभग 18%वर्ष के अंत में खर्च का दबाव बढ़ा
2025-26लगभग 20%शुरुआती पांच महीनों में सीमित प्रगति
2026-2723.87%पिछले वर्षों से थोड़ा बेहतर, पर रफ्तार अब भी सुस्त

इसलिए नहीं बढ़ रही खर्च की रफ्तार

  • टेंडर प्रक्रिया और प्रशासनिक स्वीकृति मिलने में लंबा समय
  • भूमि अधिकहा, वन एवं अन्य एनओसी मिलने में हो रही देरी
  • विभागों में समन्वय का अभाव, समय पर कायदिश का जारी नहीं होना
  • परियोजनाओं की नियमित मॉनिटरिंग और जवाबदेही का कमजोर होना

जनता पर असर

  • हर घर जल योजना और नवी जलापूर्ति परियोजनाओं की धीमी गति
  • सड़क, पुल और पलाइओवर परियोजनाओं में देरी
  • शहरों में ड्रेनेज, सड़क, स्ट्रीट लाइट और सफाई की योजनाएं प्रभावित
  • आवास योजनाओं के लाभुकों को करना पड़ रहा इंतजार
  • वर्ष के अंत में जल्दबाजी में सार्च का खतरा

ये परियोजनाएं फंसी हैं

  • बरियातू रोड में बड़गाई से बोड़ेया तक फोरलेन सड़क
  • डीएवी पुदाग से डीएवी हेहल तक नयी पोरलेन सड़क
  • खेलगांव से लेकर दुर्गा सोरेन चौक तक फोरलेन सड़क
  • पडरा-नवासोसो कांके रोड तक फोरलेन बीन कॉरिडोर
  • संधी एयरपोर्ट तक के लिए बन रही नयी फोरलेन सड़क

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