इस लॉकडाउन में क्या है स्ट्रीट फूड वालों का हाल, जल्द लौटेगा वो सड़क वाला स्वाद ?
Author : PankajKumar Pathak Published by : Prabhat Khabar Updated At : 21 May 2020 8:06 PM
इस लॉकडाउन आपने भी घर पर चाइनीज, समोसा, चाट, गोलगप्पा जैसी चीजें बनाने की कोशिश की होगी लेकिन वो स्वाद जो सड़क में ढेले पर मिलता है नहीं मिला होगा.
इस लॉकडाउन आपने भी घर पर चाइनीज, समोसा, चाट, गोलगप्पा जैसी चीजें बनाने की कोशिश की होगी लेकिन वो स्वाद जो सड़क में ढेले पर मिलता है नहीं मिला होगा. रेस्टोरेंट खुल गये हैं. स्विगी, जोमैटो जैसे प्लेटफॉर्म से आप बाहर का खाना घर पर मंगवा सकते हैं लेकिन स्ट्रीट फूड का स्वाद मिलने में वक्त लगेगा हालांकि कई जगहों पर, गलियों में आपको चाट, पापड़ी के ठेले नजर आ जायेंगे लेकिन पहले जैसी डिमांड नहीं है.
इस तरह के ठेले और छोटी दुकान लगाने वाले क्या सोचते हैं ? इस लॉकडाउन में उनकी क्या स्थिति है ? इस सवाल के साथ हमने झारखंड की राजधानी रांची की सड़कें छानी, कुछ ऐसे लोगों की तलाश की जो फास्टफूड बेचते थे. फास्टफूड के साथ- साथ अब परेशानी पान की दुकान वालों को भी है. पान मसालों के 11 ब्रांड के उत्पादन, भंडारण तथा बिक्री पर प्रतिबंध है. पढ़ें इस लॉकडाउन में उन्हें कितनी परेशानी हुई और भविष्य में उन्हें क्या उम्मीद है.

1974 से पनवाड़ी की दुकान लगाने वाले श्रीनाथ प्रसाद परेशान हैं, कहते हैं मैं मानता हूं कि यह हमारी सुरक्षा के लिए है, गुटखा पर प्रतिबंध लगा है लेकिन हमारे पास इस धंधे के अलावा दूसरा रास्ता क्या है ? अब मेरी उम्र हो गयी मैंने इसी दुकान से पांच बेटियों की शादी की. जैसे ही लॉकडाउन हुआ मुझे अपने परिवार के लिए आय का दूसरा माध्यम ढुढ़ना था, तो मैंने सब्जी की दुकान लगा ली. मेरा बेटा इसे लगाने में मेरी मदद करता है अगर यह नहीं होता तो मेरे लिए यह करना कठिन होता.
पहले से कम कमाता हूं लेकिन रोटी का जुगाड़ हो जाता है. मुझे नहीं पता कि पान पर प्रतिबंध है या नहीं लेकिन सोचता हूं कि अगर सिर्फ गुटखा पर प्रतिबंध है तब भी मेरे लिए दुकान दोबारा खोलना मुश्किल होगा. पान लगाने के लिए सुपारी की जरूरत है, कत्था चाहिए होता है. सभी पहले से बहुत ज्यादा मंहगे हो गये हैं. फिलहाल जबतक सब्जी की दुकान से काम चल रहा है इसी में मेहनत करूंगा.

पंकज गुप्ता पिछले सात सालों से एक छोटी सी गुमटी में पान मसाला बेचते थे. अब चाय की दुकान खोल ली है. पंकज कहते हैं मैंने तो पहले ही गुटखा बेचना कम कर दिया था लेकिन अपने पास रखता था. अब पूरी तरह मैं चाय पर निर्भर रहूंगा. इस लॉकडाउन से चाय के बिजनेस पर भी असर पड़ा है.
पहले मैं 30 से 35 लीटर दूध की चाय बेच देता था अब एक दिन में 10 लीटर ही हो पाता है. कमाई में फर्क पड़ा है लेकिन मेरे ज्यादातर ग्राहक सब्जी वाले और फल की दुकान वाले हैं, तो मैं चाय केतली में उनतक पहुंचा देता हूं. ग्राहकों को मेरी दुकान पर लौटने में वक्त लगेगा. चाय तो कोई भी घर पर बना कर पी सकता है लेकिन चाय की टपरी पर बैठकर मजे से चाय पीने वालों की संख्या कम नहीं है, कई लोग है जो दिन में चार- पांच बार हमारी दुकान पर आकर चाय पीते हैं. यह स्वाद आपको घर पर नहीं मिलेगा.

पोद्दार फास्टफूड के नाम पर ठेला लगाने वाले सुरेश पोद्दार बताते हैं कि लॉकडाउन लगने से पहले ही हमारे धंधे पर असर पड़ने लगा था. लॉकडाउन के बाद पूरी तरह ठप हो गया. हमने उसी ठेले में अब फल की दुकान खोल ली है.
पहले 100 कमाते थे तो अब 10 ही कमा रहे हैं. उम्मीद है कि सबकुछ ठीक हो जायेगा तो दोबारा लौटेंगे. हम दुकान खोलेंगे लेकिन लोगों को पहली तरह भरोसा करने में लोगों को वक्त लगेगा. संभव है कि हमें कोई दूसरा काम भी करना पड़े क्योंकि परिवार तो चलाना है. इस लॉकडाउन में हमारा स्वाद ही तो लोगों को याद आता है तभी तो चौमिन, अंडा रोल बनाकर खा रहे हैं लेकिन जो स्वाद उन्हें सड़क पर हमारे ठेले में मिलता है घर पर नहीं मिलेगा.

मेन रोड में हवा मिठाई की 20 से 25 पीस की डंडी लिये एक बच्चा गली- गली में यह बेच रहा है. हमें देखकर वह हमारे पास भी आता है और खरीदने की गुजारिश करता है. हमने उस बच्चे से बात की तो बताया कि पहले और अब में फर्क तो है. पहले 50 से 60 लेकर चलता था अब कम लेकर चलता हूं .
लगभग 10 साल की उम्र का महेश इसे खरीद कर बेचता है. महेश बताता है कि लोग डरते हैं बच्चे को खाने से रोकते हैं कि बाहर का है मत खाओ लेकिन हम जहां से लाते हैं वह इसे बनाते वक्त पूरा ध्यान रखते हैं. इसे बनाने के लिए पहले से वो मास्क का इस्तेमाल करते हैं अगर नहीं करेंगे तो चीनी इसके रेसे कान नाक में घूस सकते हैं. बिक्री कम हुई है लेकिन खत्म नहीं हुई व्यापार में हर दिन तो एक जैसा नहीं होता ना.

अशोक नगर में ठेले पर चाय बेचने वाले विजय पांडेय अब उसी ठेले में सब्जी बेच रहे हैं. कहते हैं, मेरे ग्राहक शाम और सुबह के वक्त तय थे लेकिन लॉकडाउन में कोई घर से नहीं निकल रहा है तो दूसरा रास्ता चुनना पड़ा.
सब्जी बड़े मार्केट से ढेले पर लाता हूं और एक – दो रुपये के मार्जिन पर बेच देता हूं. आज से ही चाय की दुकान खोली है लेकिन साथ में सब्जी भी बेच रहा हूं. अभी इससे सिर्फ गुजारा करना मुश्किल है. जिस जगह पर विजय चाय बेच रहे हैं उसी जगह पर पहले फास्ट फूड की दुकान लगती थी. मैंने पूछा कि यह कबतक खुलेगा, तो कहने लगे कि इसके लिए कारिगर चाहिए सारे कारिगर गांव चले गये. जबतक वह लौटेंगे नहीं यह खुलेगा कैसे ?

साल 1984 से चाट और फूचका का ठेला लगाने वाले भुवनेश्वर साव अब अपनी दुकान पर सूखी पापड़ी बेच रहे हैं. भुवनेश्वर कहते हैं कि जो मेरे तय ग्राहक हैं जो मेरे फुचके का स्वाद जानते हैं वह यहां से खरीद कर ले जाते हैं. मैं उन्हें स्वादिष्ट फुचका बनाने के लिए टिप्स भी दे देता हूं. साथ ही मैंने आलू और प्याज बेचना भी शुरू किया है. लॉकडाउन खत्म होने के बाद लौटूंगा. लोगों का विश्वास जीतने में समय लगेगा जैसे शुरुआत में मुझे पहचान बनाने में वक्त लगा था
. मेरी तरह का ज्यादातर काम करने वाले सब्जी बेच रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है लेकिन जैसे ही सब कुछ सामान्य होगा सभी अपने मूल काम में लौट आयेंगे क्योंकि वही काम वह दूसरों से बेहतर कर सकते हैं इतने दिनों में मैंने अनुभव किया है कि सब्जी का काम मुझसे नहीं हो पायेगा आप हिसाब समझिये पचास किलो आलू खरीदा उसमें से मान लीजिए दो किलो खराब निकला तो कोई उसे खरीदेगा नहीं, आलू हमतक पहुंचते- पहुंचते 50 किलो में वजन थोड़ा कम ही रहता है. एक दो रुपये के मार्जिन पर बेचते हैं बचता क्या है ?
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By PankajKumar Pathak
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