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सुरभि : सबसे पुरानी नाट्यमंडली

Updated at : 14 Aug 2022 1:51 PM (IST)
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सुरभि : सबसे पुरानी नाट्यमंडली

धार्मिक पौराणिक कथाओं पर आधारित सुरभि की प्रस्तुतियों का आकर्षण है रहस्य रोमांच युक्त कथा, पर्दों के इस्तेमाल से बना दृश्यबंध और दृश्य के बीच में आने वाले ट्रिक सीन.

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अमितेश, रंग समीक्षक

सुरभि नाटक मंडली की शुरुआत आंध्र प्रदेश के कड़पा जिले के एक गांव सुरभि से हुई थी. इसकी स्थापना रेकेंद्र सुभद्रम्मा और चीना वेंकटराव ने की थी. अब इस परंपरा का सूत्र परिवार की छठी पीढ़ी के हाथ में है, जिसकी शुरुआत कठपुतली के खेल दिखाने से हुई थी, जो धीरे धीरे अभिनेताओं की मंडली में तब्दील हो गयी. श्री वेंकटेश्वर सुरभि थियेटर देश की सबसे पुरानी नाट्यमंडली है. दरअसल यह एक बड़े परिवार की तरह है, जिसमें सभी का जीवन नाटक के आसपास ही चलता है. सुरभि थियेटर में महिलाओं की बहुत खास भूमिका है, जो स्थापना काल से ही मंच और नेपथ्य दोनों जगह सक्रिय हैं. हाल ही में आर नागेश्वर राव का निधन हो गया, जो इस अनोखी नाट्य मंडली के संचालक थे. उनके योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी सम्मान भी मिला था.

धार्मिक पौराणिक कथाओं, विशेषकर रामायण और महाभारत की कथाओं, पर आधारित सुरभि की प्रस्तुतियों का आकर्षण है रहस्य रोमांच युक्त कथा, पर्दों के इस्तेमाल से बना दृश्यबंध और दृश्य के बीच में आने वाले ट्रिक सीन. नाटक में वेश भूषा और साज सज्जा में चमक और तड़क भड़क का इस्तेमाल किया जाता है, जो अभिनेताओं की लार्जर दैन लाइफ छवि गढ़ता है. अभिनय भी इसी के अनुकूल होता है यानी मेलोड्रामेटिक और लाउड. गीत-संगीत कथा का अभिन्न हिस्सा होते हैं. ट्रिक सीन इन प्रस्तुतियों की जान हैं. कृष्ण द्वारा मंच पर कालिया का मर्दन, नारद जी का आकाश मार्ग से गमन, राक्षसों का आग उगलना, बिजली चमकना, तीरों का टकराना आदि दृश्य जब आते हैं, तो दर्शक चमत्कृत रह जाता है. नाटक में समस्त कार्य व्यापार पर्दों के सहारे बनाये गये दृश्यबंधों के आगे होता है जिसमें महल, जंगल, गुफा, आकाश, जेल, झरना, नदी आदि बना लिया जाता है. पर्दों पर की गयी चित्रकारी त्रिआयामी होने का आभास देती हैं. इनकी प्रस्तुतियों को देख कर लगता है कि दृश्य निर्माण की बहुत सी रूढ़ियां किस तरह से पारसी रंगमंच से होते हुए सिनेमा में आयी होंगी. मंडली की नाट्य प्रस्तुतियों पर लोकप्रिय फिल्मों का निर्माण भी हो चुका है.

इस मंडली की परंपरा के चलते रहने का कारण यह भी है कि नाटक की बदलती हुई दुनिया से भी इसने अपने आपको जागरूक रखा है. समय समय पर यह बाहर के रंगकर्मियों को प्रशिक्षण के लिए आमंत्रित भी करती है और मंडली के सदस्य भी बाहर शिक्षा लेने जाते हैं. बव कारंत जैसे निर्देशक ने भी इस मंडली के साथ काम किया है. परिवार के बच्चों को शुरू में ही नाट्य दल का सदस्य बना लिया जाता है तथा उनकी जीविका से लेकर पढ़ाई तक की जिम्मेदारी मंडली उठाती है. ‘मायाबाजार’ प्रस्तुति जब मैंने देखी थी, तो चमत्कृत रह गया था. भाषा नहीं समझ में आने के बावजूद दृश्य भाषा के प्रभाव के कारण नाटक समझने में कठिनाई नहीं हुई थी. यह मंडली हमारी संस्कृति की थाती है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने इस मंडली के पांच नाटकों के महोत्सव का आयोजन कर दिल्ली के दर्शकों को एक दुर्लभ मौका उपलब्ध कराया था.

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