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दोबारा जांच के लिए दिया आवेदन एसआइटी बनी, कर सकती है जांच, जानिए पूरा मामला

By Prabhat khabar Digital
Updated Date
राज्य में 514 युवकों को फर्जी तरीके से नक्सली और उग्रवादी बताकर सरेंडर कराने के मामले में बंद केस में फिर से अनुसंधान करने के लिए लोअर बाजार पुलिस ने न्यायालय में आवेदन दिया
राज्य में 514 युवकों को फर्जी तरीके से नक्सली और उग्रवादी बताकर सरेंडर कराने के मामले में बंद केस में फिर से अनुसंधान करने के लिए लोअर बाजार पुलिस ने न्यायालय में आवेदन दिया
प्रतीकात्मक तस्वीर

रांची : राज्य में 514 युवकों को फर्जी तरीके से नक्सली और उग्रवादी बताकर सरेंडर कराने के मामले में बंद केस में फिर से अनुसंधान करने के लिए लोअर बाजार पुलिस ने न्यायालय में आवेदन दिया है. कहा गया है कि अनुसंधान करने से नये तथ्य मिल सकते हैं. केस की जांच के लिए मुख्यालय के स्तर से एसआइटी बनी है, जो अनुमति मिलने के बाद आगे की जांच करेगी.

उल्लेखनीय है मामले में 28 मार्च 2014 को लोअर बाजार थाना में कर्रा निवासी रमेश प्रसाद की शिकायत पर केस दर्ज हुआ था. इसमें रवि बोदरा, दिनेश प्रजापति, जेरोलिन केरकेट्टा को आरोपी बनाया गया था. केस में सुपरविजन 4 अप्रैल 2014 को हुआ था. जिसमें दिग्दर्शन इंस्टीट्यूट कांटाटोली के डायरेक्टर दिनेश प्रजापति सहित प्राथमिकी के अन्य आरोपियों पर आरोप सही पाया गया था.

अनुसंधान के दौरान पता चला था कि 514 युवकों को पुरानी बिरसा मुंडा जेल में रखा गया था. वहां रजिस्टर में युवकों के नाम के आगे यह लिखा गया था कि ये सभी सरेंडर करने आये हैं. जेल में इन लोगों की सुरक्षा में तैनात कोबरा बटालियन के जवानों का भी बयान दिया गया था, जिनसे भी कई तथ्य की जानकारी पुलिस को मिली थी. लेकिन अनुसंधान के दौरान पुलिस सरेंडर करनेवाले किसी युवक को खोज नहीं सकी और न ही उनका बयान ले सकी.

मामले में एक साल बाद आरोपियों के मोबाइल नंबर का सीडीआर हासिल करने का प्रयास किया गया था1 इस वजह से पुलिस को सीडीआर भी नहीं मिले. हालांकि बयान और जांच के दौरान इस बात के साक्ष्य मिले थे कि दिग्दर्शन कोचिंग सेंटर की आड़ में पैसा लेकर युवकों को फर्जी तरीके से नक्सली और उग्रवादी बताकर सरेंडर कराने के बाद नौकरी दिलाने का झांसा दिया गया था.

अनुसंधान के दौरान 514 युवकों में से खूंटी में सरेंडर करनेवाले शंकरसन साहू से जब पुलिस ने बयान लिया था, तब यह बात सामने आयी थी कि उसने 8 फरवरी 2013 को खूंटी में सरेंडर किया था.

इसके बाद उसे सरेंडर नीति के तहत पुलिस में नौकरी और अन्य लाभ मिले थे. वहीं सीडीआर नहीं मिलने से इस बात की पुष्टि नहीं हो पायी थी कि आरोपी किन पुलिस अधिकारियों के संपर्क में थे.

जिसके कारण पुलिस अधिकारियों की संलिप्तता पर जांच किए बिना ही वर्ष 2017 में तत्कालीन सिटी एसपी अमन कुमार की अनुशंसा पर लोअर बाजार थाना प्रभारी अमन कुमार सिन्हा ने अंतिम प्रतिवेदन संख्या 356/ 17 के तहत न्यायालय में फाइनल रिपोर्ट सौंप दी थी. यह कहते हुए की केस की जांच सभी बिंदुओं पर पूर्ण है.

केस बंद करने के बाद उठे थे जो सवाल :

पहला यह कि पुलिस ने अपनी जांच को सिर्फ दिग्दर्शन इंस्टीट्यूट के लोगों तक ही सीमित रखा था. सरेंडर के नाम पर पुलिस की सुरक्षा में सभी बिरसा मुंडा पुरानी जेल में रहते थे, तब ऐसी परिस्थिति में पुलिस की संलिप्तता की बात से कैसे इंकार किया जा सकता है. दूसरा यह कि शंकरसन साहू ने दिग्दर्शन इंस्टीट्यूट के जरिये पुलिस के संपर्क में आकर सरेंडर किया था. इससे भी यह तथ्य स्पष्ट है कि दिग्दर्शन के लोगों से पुलिस का संपर्क था.

posted by : sameer oraon

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