रांची : बोआई विधि से 30 हजार एकड़ में लहलहा रहा धान
Updated at : 05 Aug 2019 8:30 AM (IST)
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संजय झारखंड ट्राइबल डेवलपमेंट सोसाइटी ने धान की खेती में किया नया प्रयोग रांची : मॉनसून में विलंब, इसका पर्याप्त न होना तथा असमय बारिश, खरीफ फसलों के लिए चुनौती है. खास कर धान, जो राज्य की प्रमुख फसल है, का कम होना लोगों की खाद्य सुरक्षा कम कर देता है. इसी चुनौती से निबटने […]
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संजय
झारखंड ट्राइबल डेवलपमेंट सोसाइटी ने धान की खेती में किया नया प्रयोग
रांची : मॉनसून में विलंब, इसका पर्याप्त न होना तथा असमय बारिश, खरीफ फसलों के लिए चुनौती है. खास कर धान, जो राज्य की प्रमुख फसल है, का कम होना लोगों की खाद्य सुरक्षा कम कर देता है. इसी चुनौती से निबटने के लिए कल्याण विभाग से संबद्ध झारखंड ट्राइबल डेवलपमेंट सोसाइटी (जेटीडीएस), रोपाई व छिंटाई विधि से अलग एक नव प्रयोग कर रहा है. वैकल्पिक विधि से करीब 30 हजार एकड़ में लगाये गये धान बीज से निकले पौधे अब लहलहा रहे हैं.
दरअसल यह विधि बहुत पुरानी है, पर अब प्रचलन में नहीं है. वह है एक निश्चित दूरी पर धान के बीज की बुआई कर खेती करना. कुल 14 जिलों की 30535 एकड़ खेत में यह प्रयोग किया गया है. इस पद्धति से धान के बीज प्री मॉनसून सीजन में ही लगा दिये जाते हैं. बीज 20-20 सेमी की दूरी पर बनी क्यारी में चार-चार सेमी के अंतराल पर लगाये गये हैं.
अब वहां लगे धान के पौधे बड़े हो गये हैं. जेटीडीएस सूत्रों के अनुसार यह विधि एसअारआइ (सिस्टम अॉफ राइस इंटेसिफिकेशन) विधि से इस मायने में अलग है कि एसआरआइ विधि में भी क्यारियों में बिचड़े लगाये जाते हैं, जबकि इस विधि में धान के बीज बोये जाते हैं. वहीं, एसआरआइ विधि में क्यारियों में जमे पानी को उसकी खुदाई कर पौधों की जड़ों में सुखाना होता है. वहीं, इस विधि में पानी सुखाने की जरूरत नहीं है.
बोअाई विधि का लाभ : जेटीडीएस के कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इस विधि से धान की खेती का सबसे बड़ा लाभ यह है कि जहां बिचड़ा लगे धान के लिए खूब पानी की जरूरत होती है. वहीं, इस विधि से प्री-मॉनसून की हल्की बारिश में ही खेत जोत कर क्यारी बना कर बीज डाल दिये जाते हैं. मिट्टी की नमी से बीज जल्द ही अंकुरित होकर बड़े होने लगते हैं. वहीं, मॉनसून आते-आते इनमें पर्याप्त वृद्धि हो चुकी रहती है. बिचड़ा लगाने वाली पारंपरिक खेती में बिचड़ा उखाड़ कर खेत में लगाये जाने के कारण इनके जड़ टूट जाते हैं.
दोबारा खेत में लगाने पर इन्हें जड़ पकड़ने में ही पांच से सात दिन का वक्त लग जाता है. बोआई विधि से लगाये गये धान बिचड़ा वाली खेती से करीब माह भर पहले लगाये जाते हैं तथा उससे पहले पक भी जाते हैं. इस विधि से लगे धान को भी पानी चाहिए, पर इसमें सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह विधि मॉनसून में विलंब की समस्या से निजात दिला देती है. बाद में औसत बारिश से भी काम चल जाता है.
क्या है परेशानी
बोआई वाली खेती में धान के पौधों के आसपास उगनेवाले घास व खर-पतवार धान की उत्पादकता 15 फीसदी तक कम कर देते हैं. इससे निबटने के लिए जेटीडीएस ने किसानों को खर-पतवार निकालने की मशीन दी है. दो क्यारी के बीच 20 सेमी की दूरी रहने से छोटे कुदाल से भी यह काम हो जाता है. इस विधि से लगे धान की फसल कम बारिश में भी अच्छी या औसत रही, तो राज्य भर में यह प्रयोग दोहराने की प्रेरणा मिलेगी.
किन-किन जिलों में हुआ प्रयोग
गोड्डा, साहेबगंज, पाकुड़, दुमका, जामताड़ा, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसांवा, खूंटी, सिमडेगा, गुमला, रांची, लोहरदगा व लातेहार.
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