वेस्ट बोकारो की 78 साल पुरानी कहानी: खदान के विस्तार की जद में आया बसा-बसाया टाउनशिप
मुखिया ललन यादव की तस्वीर | Prabhat Khabar Network
वेस्ट बोकारो में कोयला खदान विस्तार के कारण विस्थापन का संकट गहरा गया है. पंचायत मुखिया ललन कुमार यादव ने विकास कार्यों के ठप होने पर प्रशासन से मदद की मांग की है.
घाटोटांड से रवींद्र कुमार
बोकारो: वेस्ट बोकारो कोयला खदान झारखंड के रामगढ़ जिले के घाटोटांड़ क्षेत्र में स्थित एक महत्वपूर्ण कोयला परियोजना है.वेस्ट बोकारो कोलियरी की स्थापना वर्ष 1948 में एंडरसन राइट कंपनी द्वारा की गई थी. उस समय यह एक अंडरग्राउंड माइन्स के रूप में संचालित होती थी. वर्ष 1956 में टाटा स्टील ने इसका अधिग्रहण किया, जिसके बाद यहां संगठित खनन और क्षेत्रीय विकास ने गति पकड़ी. देश के विभिन्न हिस्सों से लोग यहां रोजगार की तलाश में पहुंचे और कंपनी के सहयोग से बसते चले गए.
वर्ष 1976 में वेस्ट बोकारो डिवीजन का औपचारिक गठन हुआ, जिससे यह टाटा स्टील का एक प्रमुख कोयला उत्पादन केंद्र बन गया. समय के साथ यहां एक सुव्यवस्थित और विकसित टाउनशिप बस गई. टाटा स्टील ने कर्मचारियों के लिए आधुनिक सुविधाओं से युक्त स्वच्छ आवासीय कॉलोनियां विकसित कीं. साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए स्कूल, मंदिर, अस्पताल और बाजार जैसी आधारभूत संरचनाएं भी स्थापित की गईं.
लेकिन अब बदलते समय के साथ कोयला उत्पादन बढ़ाने के लिए खदानों का विस्तार आवश्यक हो गया है.इस विस्तार की जद में वेस्ट बोकारो क्षेत्र के तीनों पंचायत आ गए हैं. स्थिति यह है कि जिस टाउनशिप को वर्षों की मेहनत और योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया था, उसे अब मजबूरी में उजाड़कर नए सिरे से खदान खोलने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है.
यह स्थिति क्षेत्र के हजारों लोगों के सामने विस्थापन का संकट खड़ा कर दिया है.जहां एक ओर विकास और उत्पादन की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर वर्षों से बसे लोगों के जीवन, आजीविका और सामाजिक ढांचे पर इसका गहरा असर पड रहा है.
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