धान रोपनी का समय खत्म, मूसलाधार बारिश के बाद भी खेतों में उतर रहे पलामू के किसान
फोटो कैप्शन: धनरोपनी करती महिलाएं | Prabhat Khabar Network
पलामू में बारिश में देरी के कारण किसान धान की रोपाई कर रहे हैं. अनाज की कम उम्मीद के बावजूद मवेशियों के चारे के लिए पुआल की आस में किसान खेत में जुटे हैं.
रामनरेश तिवारी की रिपोर्ट
पाटन (पलामू): धान रोपनी का समय लगभग समाप्त होने के बाद अंतिम दौर में हुई मूसलाधार बारिश ने किसानों को एक बार फिर खेतों की ओर खींच लिया है. पाटन प्रखंड के जंघासी, किशुनपुर समेत कई गांवों में किसान खाली पड़े खेतों में धान की रोपनी कर रहे हैं. किसानों को मालूम है कि धान रोपने का सही समय काफी हद तक निकल चुका है, फिर भी वे खेत खाली छोड़ने को तैयार नहीं हैं.
मौसम के भरोसे मेहनत और जमा पूंजी
किसान को यूं ही असली जुआरी नहीं कहा जाता. वह मौसम के भरोसे अपनी मेहनत और जमा पूंजी खेत में लगा देता है. महंगे दाम पर खाद-बीज खरीदता है, ट्रैक्टर से खेत की जुताई कराता है और खर-पतवार की निकौनी से लेकर यूरिया खाद के छिड़काव तक में पैसे खर्च करता है. इसके बाद उसकी पूरी उम्मीद आसमान पर टिकी रहती है. बारिश हुई तो फसल तैयार होने की उम्मीद, नहीं हुई तो मेहनत और पूंजी दोनों बर्बाद. इसके बावजूद किसान हार नहीं मानता. जैसे ही बारिश का पानी खेतों में पहुंचता है, वह देर से ही सही, धान की रोपनी में जुट जाता है.
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पुरवा नक्षत्र में रोपनी को लेकर पुरानी कहावत
स्थानीय किसानों के अनुसार धान की रोपनी के लिए आसरेसा और मघा नक्षत्र को बेहतर माना जाता है. इसके बाद पुरवा नक्षत्र में रोपनी को लेकर ग्रामीण इलाकों में वर्षों से कहावत चली आ रही है- "पुरवा रोपे पूरा किसान, तेरह खखरी तीन धान." यानी इस समय रोपे गये धान से भरपूर उपज की उम्मीद कम होती है. किसान इस कहावत और धान की खेती के समय को अच्छी तरह जानते हैं. इसके बावजूद इस बार पुरवा नक्षत्र में भी रोपनी करने की मजबूरी है.
पहले देसी धान से देर की रोपनी में भी मिल जाती थी उपज
किसानों का कहना है कि पहले अनंत चतुर्दशी की पूजा के बाद भी धान की रोपनी होती थी. उस समय देहाती किस्म के धान लगाए जाते थे. देर से रोपनी के बावजूद इन किस्मों से कुछ न कुछ पैदावार हो जाती थी. बाकर, डांटो, सेहरा, डांड़बाको समेत कई देसी किस्मों के धान के बिचड़े लगाए जाते थे. अब खेती का तरीका काफी बदल गया है. अधिक फसल और कम समय में तैयार होने वाली फसल के लिए अधिकांश किसान हाइब्रिड धान की ओर बढ़ गए हैं.
सिंचाई की व्यवस्था नहीं, बारिश का इंतजार बढ़ाता है परेशानी
हाइब्रिड धान के बिचड़े की रोपनी सामान्यतः कम उम्र में करना बेहतर माना जाता है. लेकिन पलामू में सिंचाई की स्थायी व्यवस्था का अभाव किसानों की बड़ी समस्या है. बारिश पर निर्भर खेती के कारण समय पर खेतों में पानी नहीं पहुंच पाता. इस वजह से बिचड़ा खेत में तैयार होकर लंबा होता जाता है और किसान बारिश का इंतजार करते-करते रोपनी का सही समय गंवा देते हैं. इसी कारण किसान ऐसी फसल पर जोर दे रहे हैं, जो कम समय में तैयार हो सके.
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धान की उम्मीद कम, पुआल की आस बाकी
किसानों को पता है कि दो माह से अधिक पुराने बिचड़े की रोपनी करने पर अपेक्षित विकास और उपज मिलना मुश्किल है. फिर भी वे खेत खाली छोड़ने के बजाय धान की रोपनी कर रहे हैं. इसकी एक बड़ी वजह मवेशियों के चारे की जरूरत भी है. पशुपालकों के लिए मवेशियों के चारे का इंतजाम करना काफी मुश्किल होता है. बिहार के इलाकों से पुआल की कुटी महंगे दाम पर लानी पड़ती है. ऐसे में किसानों को उम्मीद है कि देर से रोपे गए धान से भले ही अनाज की अच्छी उपज न मिले, लेकिन फसल तैयार होने पर पुआल जरूर मिल जाएगा.
खेत खाली न रहे, मवेशियों का चारा मिल जाए
किसानों के लिए अब यह खेती केवल अनाज पैदा करने का जरिया नहीं रह गई है. पशुधन को बचाए रखने के लिए भी वे खेत में धान की रोपनी कर रहे हैं. उनका कहना है कि अगर अनाज कम भी मिला, तो कम से कम पुआल मिल जाएगा, जो मवेशियों के चारे के काम आएगा. किसानों को खेत में मेहनत करने के बावजूद यह भरोसा नहीं है कि फसल कितनी होगी. फिर भी उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है. पुरवा नक्षत्र में धान की रोपनी इसी उम्मीद में हो रही है कि शायद अनाज कम मिले, लेकिन खेत खाली नहीं रहेगा और मवेशियों के लिए पुआल तो मिल ही जाएगा.
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