पहाड़ से आत्मनिर्भरता तक: पहाड़िया दीदियों ने मिलकर खड़ा किया 90 लाख का बिजनेस

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बोरा सिलाई करतीं गुतु गलांग की दीदियां. | Prabhat Khabar Network

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लिट्टीपाड़ा की पहाड़िया महिलाएं गुतु गलांग कल्याण ट्रस्ट से जुड़कर बोरा सिलाई का काम कर रही हैं. सालाना 8.85 लाख बोरे सिलकर पूरे झारखंड में आपूर्ति की जाती है.

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लिट्टीपाड़ा: लिट्टीपाड़ा के सुदूर ग्रामीण और दुर्गम पहाड़ी इलाकों में कभी पारंपरिक खेती तक सीमित रहने वाली पहाड़िया जनजाति की महिलाएं अब स्वरोजगार से जुड़कर आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ रही हैं. गुतु गलांग कल्याण ट्रस्ट ने इन महिलाओं को रोजगार से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है.

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वर्ष 2019 में शुरू हुए ट्रस्ट के माध्यम से महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण दिया गया और उन्हें बोरा सिलाई के काम से जोड़ा गया. आज यही महिलाएं मुख्यमंत्री डाकिया योजना के तहत खाद्यान्न वितरण में इस्तेमाल होने वाले बोरों की सिलाई और आपूर्ति कर रही हैं.

15 दीदियों से हुई शुरुआत, अब पूरे झारखंड तक पहुंचा काम

बोरा सिलाई के काम की शुरुआत क्षेत्र की 15 पहाड़िया महिलाओं से हुई थी. इन महिलाओं ने जेएसएलपीएस से जुड़कर कौशल प्रशिक्षण हासिल किया और सिलाई का काम सीखा.

पहाड़ों से नीचे उतरकर रोजगार की दिशा में कदम बढ़ाना इन महिलाओं के लिए आसान नहीं था. इसके बावजूद उन्होंने धीरे-धीरे अपने हुनर को निखारा और इस काम में अपनी पहचान बनायी.

आज गुतु गलांग कल्याण ट्रस्ट से जुड़ी महिलाएं अपने कौशल के दम पर पूरे झारखंड में बोरा सिलाई और आपूर्ति का काम कर रही हैं.

सालाना 8.85 लाख बोरों की सिलाई, 80 से 90 लाख का कारोबार

गुतु गलांग कल्याण ट्रस्ट से जुड़ी महिलाओं को मुख्यमंत्री डाकिया योजना के तहत खाद्यान्न वितरण के लिए इस्तेमाल होने वाले बोरों की सिलाई और आपूर्ति का काम मिल रहा है.

महिलाओं के अनुसार, हर साल करीब 8 लाख 85 हजार बोरों की सिलाई कर पूरे झारखंड में आपूर्ति की जाती है. इससे सालाना करीब 80 से 90 लाख रुपये का कारोबार हो रहा है.

इस काम से जुड़ी महिलाओं को नियमित आमदनी का जरिया मिला है. वे अब अपने परिवार के खर्च और बच्चों की जरूरतों को पूरा करने में आर्थिक सहयोग कर पा रही हैं.

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पहाड़ों के संघर्ष से आत्मनिर्भरता तक का सफर

अपनी सफलता की कहानी साझा करते हुए दीदी रूबी पहाड़िन, चांदी पहाड़िन, मोनिका मालतो और सारा मालतो ने बताया कि पहले वे पहाड़ों पर रहकर पारंपरिक खेती पर निर्भर थीं.

मौसम की मार और सीमित संसाधनों के कारण परिवार चलाने में कई तरह की परेशानियां आती थीं. जेएसएलपीएस के माध्यम से गुतु गलांग कल्याण ट्रस्ट से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बदलाव आया.

अब महिलाएं अपनी आमदनी से घर के खर्च में सहयोग करने के साथ बच्चों की जरूरतों को पूरा करने में भी योगदान दे रही हैं.

बोरा सिलाई करती गुतू गलान की दिदिया | Prabhat Khabar Network
बोरा सिलाई करतीं गुतु गलांग की दीदियां. | Prabhat Khabar Network

आधुनिक मशीन और तकनीक मिले तो बढ़ेगा उत्पादन

महिलाओं का कहना है कि यदि उन्हें आधुनिक सिलाई मशीन और बेहतर तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराये जाएं, तो उत्पादन क्षमता को और बढ़ाया जा सकता है.

उनका मानना है कि इससे न सिर्फ मौजूदा काम का विस्तार होगा, बल्कि क्षेत्र की अन्य पहाड़िया महिलाओं को भी रोजगार से जोड़ने का अवसर मिलेगा.

महिलाओं के लिए रोजगार का बना नया रास्ता

लिट्टीपाड़ा के पहाड़ी क्षेत्रों में महिलाओं का बोरा सिलाई से जुड़ना उनके लिए आय का नया माध्यम बना है. पारंपरिक खेती पर निर्भर परिवारों की महिलाओं को अब घर और परिवार की जिम्मेदारियों के साथ रोजगार से जुड़ने का अवसर मिल रहा है.

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