कोडेरमा : पर्यूषण के सातवें दिन मुनि सुयश सागर ने बताया तप का महत्व, बोले - इच्छाओं का त्याग ही सच्चा तप

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दसलक्षण पर्यूषण का सातवां दिन उत्तम तप धर्म के रूप में मनाया गया | Prabhat Khabar Network

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जैन मुनि सुयश सागर के अनुसार, इच्छाओं का त्याग ही उत्तम तप धर्म है. शांति से दुख सहन कर आत्मा की शुद्धि और मोक्ष मार्ग की प्राप्ति का रहस्य जानें.

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सूजल भदानी की रिपोर्ट

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झुमरीतिलैया. जैन धर्म के पर्वाधिराज दसलक्षण पर्यूषण के सातवें दिन मंगलवार को जैन धर्मावलंबियों ने उत्तम तप धर्म के रूप में मनाया. इस अवसर पर झुमरीतिलैया में चातुर्मास कर रहे जैन मुनि श्री 108 सुयश सागर गुरुदेव ने साधर्मी बंधुओं को तप धर्म का महत्व बताया. मुनि सुयश सागर ने कहा कि इच्छाओं का त्याग करना ही तप धर्म है. शांति के साथ दुख सहन करना सबसे बड़ा तप है. उन्होंने कहा कि तप के बिना आत्मा की शुद्धि संभव नहीं है. जिस प्रकार जमीन में पड़ी मिट्टी आग में तपने के बाद मूर्ति का आकार लेकर पूजनीय हो जाती है, उसी तरह तप मनुष्य के जीवन को निखारता और तराशता है.

संयम के साथ तप जरूरी

मुनि सुयश सागर ने कहा कि तप विशुद्धि और वाणी संयम के साथ किया जाना चाहिए. मोक्ष मार्ग की प्राप्ति के लिए अंत:करण को स्वच्छ रखते हुए संयम के साथ तप करना जरूरी है. ऐसा तप ही कर्मों की निर्जरा का साधन बनता है. उन्होंने कहा कि यदि अंतरंग में शांति रूपी तप धारण नहीं किया गया, तो बाहरी तपस्या भी सार्थक नहीं हो सकती. नियम और संयम से जीवन जब श्रृंगारित होता है, तभी व्यक्ति तप के मार्ग पर आगे बढ़ता है. आत्मा में अनंत शक्ति निहित है, जिसे तप के माध्यम से निखारा जा सकता है.

जैन धर्म की पहचान तप, त्याग और तपस्या

मुनि ने कहा कि जैन धर्म की पहचान तप, त्याग और तपस्या से है. जैन दर्शन मनुष्य को भगवान बनने का मार्ग दिखाता है. भेद विज्ञान के माध्यम से आत्मस्वरूप को पहचानना जरूरी है. उन्होंने कहा कि मंगल ग्रह में मंगल खोजने के बजाय अपने जीवन में मंगल खोजने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि कर्मों का क्षय कर सिद्धत्व की ऊंचाई प्राप्त करना ही जैन दर्शन का उद्देश्य है. व्यक्ति को अपना जीवन ऐसा बनाना चाहिए कि उससे न किसी को कांटा लगे और न किसी के जीवन में कांटा चुभे. तप के माध्यम से भक्त से भगवान बनने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है. मुनि सुयश सागर ने कहा कि जैन धर्म वैज्ञानिक धर्म है. जीवन में सुखी रहना है तो इच्छाओं को कम करना होगा. तप में कष्ट नहीं, बल्कि आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है.

विभिन्न मंदिरों में हुआ अभिषेक और शांतिधारा

प्रात: मुनि सुयश सागर जी के मुखारविंद से बड़ा मंदिर की मूल वेदी में भगवान पारसनाथ के प्रथम कलश और शांतिधारा का सौभाग्य दिलीप मुन्ना बाकलीवाल परिवार को मिला. मुनि सुब्रतनाथ भगवान का श्री विहार कर प्रथम कलश एवं शांतिधारा का सौभाग्य राकेश आदित्य छाबड़ा परिवार को प्राप्त हुआ. पंडाल परिसर में भगवान महावीर स्वामी का श्री विहार एवं प्रथम अभिषेक अनिल रौनक कासलीवाल परिवार और प्रमोद खुशबू पांडया परिवार ने किया. वहीं भगवान महावीर स्वामी की महाशांतिधारा का सौभाग्य विमल संजय अजय बढ़जातया परिवार और शशि रीता सेठी परिवार को मिला. नया मंदिर, पानी टंकी रोड में भगवान महावीर की शांतिधारा सुनील रोशन अतिशय छाबड़ा परिवार और निर्मल दिनेश नरेश झाझंरी परिवार ने की. भगवान आदिनाथ की शांतिधारा का सौभाग्य सुरेश शैलेश सौरभ लूहारिया परिवार को प्राप्त हुआ.

‘णमोकार मंत्र सजाओ फ्रेम प्रतियोगिता’

रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान ‘णमोकार मंत्र सजाओ फ्रेम प्रतियोगिता’ आयोजित की गई. प्रतियोगिता में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया.यह जानकारी जैन समाज के मीडिया प्रभारी नवीन जैन और राजकुमार अजमेरा ने दी.

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