करम पर्व में क्यों बोए जाते हैं सात तरह के बीज? जानिए इसके पीछे सदियों पुरानी परंपरा
प्रभात खबर के प्रतिनिधि समीर उरांव ट्राइबल एडवाइजरी कमेटी के सदस्य नारायण उरांव से बातचीत करते हुए
करम पर्व में जावा उगाने की परंपरा प्रकृति और खेती से गहरी है. जानिए क्यों बोए जाते हैं 7 बीज और इसके पीछे की अनोखी मान्यताएं.
इनपुट : तन्वी झा
Karam festival: करम पर्व केवल पूजा, उपवास और नाच-गाने का त्योहार नहीं है. इसके पीछे प्रकृति, खेती और समाज से जुड़ी कई पुरानी परंपराएं हैं. करम पर्व की ऐसी ही एक खास रस्म है जावा उगाना पर्व से पहले युवतियां बालू में अलग-अलग अनाज के बीज बोती हैं और कई दिनों तक उनकी देखभाल करती हैं. धीरे-धीरे इन बीजों से छोटे-छोटे पौधे निकलते हैं, जिन्हें जावा कहा जाता है. लेकिन सवाल यह है कि जावा उगाने के लिए 7 बीज ही के लिया जाता है, इसके पीछे की सोच और मनायता क्या है.
प्रभात खबर के प्रतिनिधि से बातचीत करते हुए केंद्रीय सरना समिति के सदस्य और ट्राइबल एडवाइजरी कमेटी के सदस्य नारायण उरांव ने बताया कि जावा की परंपरा बहुत पुरानी है. उनके अनुसार, इसकी कहानी उरांव समाज के रोहतासगढ़ में रहने के समय से जुड़ी मानी जाती है.
रोहतासगढ़ से जुड़ी है जावा की कहानी
नारायण उरांव ने बताया कि लोकमान्यता के अनुसार, जब उरांव समाज के लोग रोहतासगढ़ में रहते थे, उस समय वहां हमला हुआ. इस दौरान राजा और कई लोग मारे गए. राजा की रानी ने करम पेड़ के नीचे शरण ली. कहा जाता है कि रानी के पास उस समय खाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था. उनके आंचल में चावल और उड़द जैसे अनाज थे. जब वह करम पेड़ के नीचे रह रही थीं, तो ये बीज वहां गिर गए और बाद में उनमें अंकुर निकलने लगे.
रानी को करम पेड़ के नीचे ही शरण मिली थी और वहीं इन बीजों के अंकुरित होने की कहानी को आगे चलकर जावा की परंपरा से जोड़ा गया. नारायण उरांव ने इसी लोककथा को जावा की परंपरा की शुरुआत से जोड़ते हुए बताया.
जावा को धूप में क्यों नहीं रखा जाता?
जावा की इस परंपरा में एक खास बात यह है कि इसे आमतौर पर सीधी धूप से दूर रखा जाता है. नारायण उरांव के अनुसार, रानी के पास गिरे बीज करम पेड़ के नीचे बढ़े थे, जहां उन्हें सीधी धूप नहीं मिलती थी. इसी वजह से उनमें हरियाली के बजाय पीलापन दिखाई दिया.

इसी लोकमान्यता के कारण आज भी कई जगह जावा को अंधेरे या कम रोशनी वाले स्थान पर रखा जाता है. इसमें हल्दी मिला पानी डालने की परंपरा भी बताई गई है, जिससे जावा का रंग पीला दिखाई देता है.
वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो पौधे को रोशनी कम मिलने पर उसका पीला पड़ना संभव है. पौधों में पर्याप्त रोशनी न मिलने पर क्लोरोफिल का विकास प्रभावित होता है, जिससे पत्तियां पीली दिखाई दे सकती हैं. हालांकि, जावा की परंपरा की शुरुआत के बारे में रोहतासगढ़ वाली कहानी एक लोकमान्यता है, इसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित इतिहास नहीं माना जा सकता.
सात तरह के बीज क्यों बोए जाते हैं?
करम पर्व में अलग-अलग क्षेत्रों में जावा में अलग-अलग बीज इस्तेमाल किए जाते हैं. कई जगहों पर सात तरह के बीज बोने की परंपरा है. इनमें स्थानीय परंपरा के अनुसार धान, गेहूं, जौ, मकई, चना, उड़द आदि अनाज शामिल हो सकते हैं. सात बीजों के पीछे एक ही निश्चित वैज्ञानिक कारण प्रमाणित नहीं है. लेकिन खेती के नजरिए से इसे फसल विविधता और बीजों की अहमियत से जोड़कर देखा जा सकता है. अलग-अलग बीज अलग परिस्थितियों में उगते हैं और उनकी जरूरतें भी अलग होती हैं. जावा के जरिए नई पीढ़ी को अलग-अलग फसलों और उनके अंकुरण की प्रक्रिया से परिचित कराया जाता है. यानी जावा केवल पूजा की सामग्री नहीं है, यह खेती और प्रकृति से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को भी आगे बढ़ाने का एक तरीका है.

बीज से पौधा बनने की प्रक्रिया भी दिखती है
जावा तैयार करने में बीज को बालू में बोया जाता है और उसमें पानी दिया जाता है. कुछ दिनों में बीज फूटने लगते हैं और उनमें छोटी-छोटी जड़ें और अंकुर निकलते हैं. यह पूरी प्रक्रिया यह समझने का पारंपरिक तरीका भी मानी जा सकती है कि एक छोटा सा बीज कैसे पौधे में बदलता है. खेती पर आधारित समाज में बीज, पानी, मिट्टी और मौसम का महत्व बहुत ज्यादा रहा है. इसलिए करम पर्व की इस रस्म में खेती का संदेश साफ दिखाई देता है.
जावा सिर्फ पूजा नहीं, प्रकृति से जुड़ने का माध्यम
करम पर्व में करम पेड़ को विशेष महत्व दिया जाता है. जावा में बीज बोना और उनकी देखभाल करना भी प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना से जुड़ा है. नारायण उरांव के अनुसार, करम पर्व में उपवास, करम देव की पूजा, करम डाल की स्थापना और जावा जैसी रस्में एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. पर्व का उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज को अपनी परंपरा और प्रकृति से जोड़ना भी है.
आधुनिक दौर में बदल रहा है करम पर्व
नारायण उरांव ने बातचीत में यह भी कहा कि आधुनिक समय में करम पर्व के पारंपरिक रूप में बदलाव आया है. पहले करम गीत, मांदर और पारंपरिक नृत्य इसके केंद्र में होते थे. अब कई जगहों पर डीजे और आधुनिक संगीत ने अपनी जगह बना ली है. उनके मुताबिक, आदिवासी समाज का बहुत सा पारंपरिक ज्ञान लिखित रूप में नहीं बल्कि गीतों, नृत्य और मौखिक परंपरा के जरिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ा है. इसलिए अगर पारंपरिक गीत और नृत्य पीछे छूटेंगे, तो इनके साथ जुड़ा ज्ञान भी धीरे-धीरे कमजोर हो सकता है.

नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़ना जरूरी
करम पर्व की परंपराओं को बचाने के लिए केवल पर्व मनाना ही काफी नहीं है. नई पीढ़ी को यह बताना भी जरूरी है कि जावा क्यों उगाया जाता है, करम डाल का क्या महत्व है, पारंपरिक गीतों का अर्थ क्या है और इन सबका प्रकृति और खेती से क्या संबंध है. स्कूल-कॉलेजों में स्थानीय संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम, पारंपरिक गीत-संगीत की रिकॉर्डिंग और स्थानीय बुजुर्गों के अनुभवों को दर्ज करने जैसे प्रयास किए जा सकते हैं.
जावा में छिपा है पीढ़ियों का ज्ञान
करम पर्व में बोया जाने वाला जावा एक छोटा सा पौधा जरूर है, लेकिन इसके साथ समाज की एक लंबी परंपरा जुड़ी है. इसमें लोककथा है, खेती है, प्रकृति के प्रति सम्मान है और नई पीढ़ी को पुरानी बातों से जोड़ने का माध्यम भी है. सात बीजों के पीछे कोई एक प्रमाणित वैज्ञानिक कारण बताना सही नहीं होगा, लेकिन बीजों का अंकुरण, रोशनी का असर, फसल विविधता और खेती के प्रति जागरूकता जैसे वैज्ञानिक पहलुओं से इस परंपरा को समझा जा सकता है. इसलिए करम पर्व का जावा सिर्फ पूजा में रखा जाने वाला अंकुर नहीं, बल्कि बीज से जीवन, खेती से समाज और प्रकृति से इंसान के रिश्ते की कहानी भी
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