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कथावाचक ने भगवान श्रीराम के नामकरण का सुनाया प्रसंग

Updated at : 04 Nov 2025 9:20 PM (IST)
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कथावाचक ने भगवान श्रीराम के नामकरण का सुनाया प्रसंग

मुरलीपहाड़ी. नारायणपुर प्रखंड के कमलडीह में श्रीमद्भागवत कथा जारी है. कथावाचक सुमन उपाध्याय ने भगवान श्रीराम के जन्म के बाद नामकरण प्रसंग सुनाया.

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नारायणपुर प्रखंड के कमलडीह में श्रीमद्भागवत कथा जारी प्रतिनिधि, मुरलीपहाड़ी. नारायणपुर प्रखंड के कमलडीह में श्रीमद्भागवत कथा जारी है. कथावाचक सुमन उपाध्याय ने भगवान श्रीराम के जन्म के बाद नामकरण प्रसंग सुनाया. कहा कि श्रीराम के जन्म के बाद राजा दशरथ ने सबको उपहार देकर विदा किया. कुछ दिन बीत जाने के बाद नामकरण संस्कार का समय जानकर राजा दशरथ ने मुनि वशिष्ठ को बुलाया. उन्होंने मुनि से अपने चारों पुत्रों के नामकरण का आग्रह किया. मुनि ने कहा कि हे राजन इनके अनुपम नाम हैं, फिर भी मैं अपनी बुद्धि के अनुसार अपना कार्य करूंगा. उन्होंने कहा कि जो आनंद के समुद्र और सुख की राशि हैं, जिस आनंद सिंधु के एक कण से तीनों लोक सुखी होते हैं, जो सुख का भवन और संपूर्ण लोकों को शांति देने वाला है, वह नाम है राम. इसी के साथ जो संसार का भरण-पोषण करते हैं, तो आपके दूसरे पुत्र का नाम भरत होगा, जिनके स्मरण मात्र से शत्रु का नाश होता है, उनका वेदों में प्रसिद्ध शत्रुघ्न नाम है. वहीं जो शुभ लक्षणों के धाम, श्रीराम के प्यारे और सारे जगत के आधार हैं, उनका श्रेष्ठ नाम लक्ष्मण है. मुनि वशिष्ठ ने कहा कि राजन तुम्हारे चारों पुत्र वेद के तत्व हैं. कथावाचक ने कहा कि बचपन से ही श्रीराम चंद्र को अपना परम हितैषी स्वामी जानकर लक्ष्मण ने उनके चरणों में प्रीति जोड़ ली. भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयों में स्वामी और सेवक की प्रीति की प्रशंसा है. कहा कि श्याम और गौर शरीर वाली दोनों सुंदर जोड़ियों की शोभा को देखकर माताएं अलौलिक आनंद का अनुभव करती है. उन्होंने भगवान श्रीराम की बाल लीलाओं को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया. कहा कि विनम्रता और करुणा के स्वर में की गई वंदना अवश्य फल देते हैं. विनम्रता में बहुत ताकत है, जो पत्थर की मूर्ति को भी मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है. कहा कि गुरु से कभी कोई बात छिपानी नहीं चाहिए. श्रीराम ने भी फुलवारी प्रसंग के बाद अपने मन की इच्छा गुरु को बताई और उनका कार्य भी सिद्ध हुआ. समाज की समस्या ही धनुष है. धनुष अहंकार का प्रतीक है. इसलिए उसे तोड़ना बहुत जरूरी था. दुष्ट राजा धनुष को तोड़ने का असफल प्रयास करते हैं, लेकिन समस्या का समाधान ईश्वर की अनुकंपा से ही होता है. श्री राम ने धनुष को खंड-खंड कर दिया. धमक सुनकर इसी समय मंडप में परशुराम का प्रवेश होता है, जो क्रोध से आगबबूला होकर फरसे से श्रीराम का वध करना चाहते हैं, लेकिन उनका हाथ स्थिर हो जाता है. लक्ष्मण कहते हैं कि आपने श्रीराम को नहीं पहचाना. आपके फरसे ने तो पहचान लिया. शस्त्र ने पहचान लिया शास्त्र ने नहीं पहचाना. परशुराम ने भगवान श्रीराम की परीक्षा के लिए उनके धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहा तो विष्णु का धनुष स्वयं श्रीराम के चरणों में आ गया. इसके बाद परशुराम तपस्या के लिए प्रस्थान कर जाते हैं और राजा जनक विवाह की लगन पत्रिका राजा दशरथ के पास भेजते हैं. राजा दशरथ बारात लेकर जनकपुर के लिए प्रस्थान करते हैं. कहा कि पूरी रामकथा ही सेतुबंध है, जो दो परिवारों, दो राज्यों तथा दो संस्कृतियों को जोड़ती है. मौके पर यज्ञाचार्य श्यामा कांत पांडेय, सिंगर सुजीत पांडेय, सत्यनारायण उपाध्याय, यजमान गोपाल रवानी सपत्नी सहित देवेंद्र नाथ तिवारी, सत्य नारायण तिवारी, अजीत ओझा, वरुण रवानी आदि मौजूद थे.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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JIYARAM MURMU

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