jamshedpur news : पाक सेना के सिग्नल्स को इंटरसेप्ट कर हिला दी थी दुश्मन की चूलें
Updated at : 16 Feb 2026 10:13 PM (IST)
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जमशेदपुर (फाइल फोटो)
1971 के युद्धवीर घनश्याम सिंह को अंतिम विदाई, सम्मान में ओढ़ाया गया तिरंगा
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1971 के युद्धवीर घनश्याम सिंह को अंतिम विदाई, सम्मान में ओढ़ाया गया तिरंगा
jamshedpur news :
1971 के भारत-पाक युद्ध के नायक और अदम्य साहस के प्रतीक हवलदार घनश्याम प्रसाद सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे. उन्होंने पाक सेना के सिग्नल्स को इंटरसेप्ट कर उनकी हर रणनीति को विफल बना दिया था. 77 वर्ष की आयु में रविवार की रात को उनका निधन राष्ट्र और पूर्व सैनिक संगठन के लिए एक अपूरणीय क्षति है. उनके निधन पर अखिल भारतीय पूर्व सैनिक सेवा परिषद, जमशेदपुर ने गहरा दुख व्यक्त किया है. सोमवार को अंतिम यात्रा के दौरान घनश्याम सिंह के पार्थिव शरीर पर तिरंगा चढ़ाया गया, जिसे अंतिम संस्कार के पूर्व उनके परिवार को सौंप कर सम्मान प्रदान किया गया. परिषद के सदस्य नरसिंह सिंह, परशुराम सिंह, ओपी प्रसाद और वरुण कुमार ने उन्हें नम आंखों से विदाई दी. कदमा निवासी घनश्याम सिंह ने न केवल रणभूमि में शौर्य दिखाया, बल्कि युद्ध की आधिकारिक घोषणा से पहले ही अपनी बुद्धिमत्ता से पाकिस्तानी सेना की तैयारियों को ध्वस्त करने में बड़ी भूमिका निभाई थी. सिग्नल कोर के सिपाही के तौर पर घनश्याम सिंह की भूमिका बेहद संवेदनशील थी. उन्हें 33 कोर के साथ मिलकर गुप्त सूचनाएं एकत्र करने की जिम्मेदारी मिली थी. युद्ध शुरू होने से महीनों पहले, मई 1971 से ही वे मोर्चे पर डट गये थे. उनका मुख्य कार्य पाकिस्तानी सेना के वायरलेस सिग्नल्स को इंटरसेप्ट करना और उनकी गोपनीय रणनीतियों को डिकोड करना था. वे रात के अंधेरे में वे मुक्ति वाहिनी के सैनिकों के साथ मिलकर क्षेत्रों का भ्रमण करते थे और दुश्मन की फौजी गाड़ियों व उनकी लोकेशन की सटीक जानकारी जुटाते थे.लूंगी पहनकर करते थे जासूसी
नायक घनश्याम सिंह की जासूसी की गाथा किसी फिल्म से कम नहीं थी. वे बांग्लादेशी नागरिकों के बीच अपनी पहचान छिपाने के लिए दिन भर लूंगी और टी-शर्ट पहनकर अलग-अलग घरों में छिपे रहते थे. उन्हें बांग्ला भाषा नहीं आती थी, इसके बावजूद वे अपनी चतुराई से पकड़े जाने से बचे रहे. दिन भर पहचान छिपाकर रहना और पूरी रात जासूस बनकर सूचनाएं एकत्र करना ही उनकी दिनचर्या थी. सूर्योदय से पहले वे अपनी पूरी रिपोर्ट 33 कोर को भेज देते थे, जिससे भारतीय सेना को बढ़त मिलती थी.मेडल से हुए थे सम्मानित
22 फरवरी 1967 को सेना के सिग्नल कोर में भर्ती हुए घनश्याम सिंह को उनकी वीरता के लिए ””ईस्टर्न स्टार””, ””संग्राम”” और ””विदेश सेवा मेडल”” से नवाजा गया था. उनके आदर्श और देशप्रेम की गाथा आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी.प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी
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