डुमरी. डुमरी प्रखंड के बड़ा कटरा गांव में स्थित गलगुटरा उर्फ गट्टी पहाड़ अपने अंदर धार्मिक, सामाजिक, ऐतिहासिक व पौराणिक कथाओं का अद्भुत समन्वय समेटे हुए है. यह पहाड़ केवल एक प्राकृतिक संरचना नहीं, बल्कि स्थानीय ग्रामीणों की गहरी आस्था, विश्वास व परंपराओं का जीवंत प्रतीक है. पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में गलगुटरा पहाड़ पर एक विशाल बाजार लगता था, जहां दूर-दराज के क्षेत्रों से लोग व्यापार के लिए आते थे. बाद में शत्रुओं (फौद) के आक्रमण के कारण लोगों को खदेड़ दिया गया और यह बाजार समाप्त हो गया. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार पहाड़ के ऊपर एक तालाब था, जहां एक विशाल सर्प का वास था. कहा जाता है कि यह सर्प गांव वालों को नुकसान पहुंचाता था. तब देवताओं ने लोगों की रक्षा के लिए उस दुष्ट सर्प को सात टुकड़ों में काट दिया. आज भी गलगुटरा पहाड़ पर उन सात टुकड़ों के पत्थर रूपी अवशेष मौजूद बताये जाते हैं, जिन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है. एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विश्वकर्मा व भगवान महादेव के बीच टांगीनाथ धाम और गलगुटरा पहाड़ पर एक ही रात में मंदिर निर्माण की प्रतियोगिता हुई थी. शर्त थी कि जिसका मंदिर पहले पूरा होगा, वही दीप प्रज्वलित करेगा. निर्माण के दौरान टांगीनाथ धाम में हथौड़ा गिरने से दीप जल गया. सुबह पता चला कि मंदिर अधूरा है, जिससे क्रोधित होकर भगवान महादेव ने फरसा चला कर मंदिर को ढहा दिया. इसके परिणामस्वरूप आज भी टांगीनाथ धाम व गलगुटरा पहाड़ क्षेत्र में पौराणिक ईंटों के अवशेष देखे जाते हैं.
साल में तीन बार होती है गलगुटरा पहाड़ की पूजा
गांव के वरिष्ठ बीरबल बैगा बताते हैं कि गलगुटरा पहाड़ को बड़ा कटरा गांव के लोग ग्राम देवता के रूप में पूजते हैं. यहां नियमित पूजा होती है और परंपरा के अनुसार साल में तीन बार विशेष पूजा की जाती है, जिसे बैगा समुदाय पीढ़ियों से निभाता आ रहा है. मान्यता है कि प्राचीन काल में सिंधु घाटी से रोहतासगढ़ होते हुए पूर्वज इस क्षेत्र में पहुंचे थे. बड़ा कटरा और ढोठीपाठ के बीच बोड़या नदी के किनारे असुर, आदिम और बैगा तीन समुदाय आकर बसे.
तीन क्षेत्रों में बसीं तीन जनजातियां
समय के साथ असुर जाति जरहापाठ (वर्तमान में छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के मनोरा ब्लॉक) चली गयी, आदिम जाति अस्ता क्षेत्र में बस गई और बैगा समुदाय ढोठीपाठ होते हुए झारखंड के बड़ा कटरा गांव में बस गया. बीरबल बैगा स्वयं को बैगा बोड़या, करिया, झरिया, बेजगा, विरो, लोहरा और सुखू बैगा वंश की आठवीं पीढ़ी बताते हैं और आज भी गांव की पूजा-परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं.
सरना पूजा के बाद खत्म हुआ हाथियों का आतंक
गांव पहाड़ की तराई में स्थित होने के कारण पहले हाथियों का आतंक बना रहता था. हाथियों की समस्या से परेशान होकर वर्ष 1988 में ढोठीपाठ सरना में पूजा की शुरुआत की गयी. इस समय सुखू बैगा वंश पर परंपरा और जिम्मेदारी का निर्वहन था. मान्यता है कि ढोठीपाठ सरना में विशेष पूजा शुरू होने के बाद गांव से हाथियों का आतंक समाप्त हो गया. आज भी हाथी क्षेत्र में आते हैं, लेकिन गांव के भीतर प्रवेश नहीं करते.
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