जावा की हरियाली से क्यों जुड़ी है भाइयों की सुख-समृद्धि? जानें केराडीह में कैसे मनाया गया करमा पर्व

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करम उत्सव में शामिल युवतियां व महिलाएं | Prabhat Khabar Network

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केराडीह में भादो एकादशी पर करमा पर्व धूमधाम से मना. इसमें बहनों ने भाई की सुख-समृद्धि के लिए उपवास रखा और प्रकृति की पूजा की. ढोल-नगाड़े पर सामूहिक नृत्य से गांव में उत्साह दिखा.

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गिरिडीह. भादो एकादशी के अवसर पर मनाये जाने वाले करमा पर्व की उमंग गिरिडीह के गांवों में दिखने लगी है. गांडेय प्रखंड के केराडीह में करमा पर्व के मौके पर करम डाल और जावा की पूजा की गयी. पूजा के बाद युवतियों और महिलाओं ने ढोल, मांदर और नगाड़े की थाप पर सामूहिक नृत्य किया. करमा पर्व में भाई की सुख-समृद्धि, परिवार की खुशहाली और अच्छी फसल की कामना की जाती है. झारखंड की आदिवासी-मूलवासी परंपरा से जुड़े इस पर्व में प्रकृति के प्रति आस्था भी प्रमुख रूप से दिखाई देती है.

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करमा पर्व के दौरान बहनें अपने भाइयों की सलामती और समृद्धि के लिए उपवास रखती हैं. वहीं, पूजा के माध्यम से बेहतर फसल और सुख-शांति की कामना की जाती है. गांवों में पर्व के दौरान सामूहिक रूप से पूजा और नृत्य का आयोजन होता है, जिसमें अलग-अलग समुदायों के लोग भी सहभागिता करते हैं.

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नदी की बालू में बोये जाते हैं सात प्रकार के अन्न

करमा पूजा की तैयारी कई दिन पहले शुरू हो जाती है. परंपरा के अनुसार पूजा से करीब नौ दिन पहले टोकरी में नदी की बालू रखकर उसे सजाया जाता है. इसके बाद उसमें सात प्रकार के अन्न बोये जाते हैं. नौ दिनों में इन अनाजों के पौधे अंकुरित हो जाते हैं, जिन्हें जावा कहा जाता है. पूजा स्थल को पत्तियों और फूलों से सजाया जाता है.

करमा पूजा में शामिल होने वाली व्रती स्नान कर शाम को नये वस्त्र धारण करती हैं. शाम के समय युवा करम डाल काटकर पूजा स्थल तक लाते हैं. पुजारी विधि-विधान के साथ करम डाल को स्थापित कर पूजा कराते हैं. इसके बाद करमा-धरमा की कथा सुनायी जाती है. पूजा संपन्न होने के बाद जावा को कानों में खोंसकर युवक-युवतियां और अन्य ग्रामीण करमा गीतों पर सामूहिक नृत्य करते हैं.

करमा-धरमा की कथा में कर्म का संदेश

करमा पर्व के साथ करमा-धरमा की कथा भी जुड़ी है. लोकमान्यता के अनुसार करमा और धरमा दो भाई थे. दोनों मेहनती और दयालु थे. करमा की शादी के बाद उसकी पत्नी के व्यवहार से वह नाराज होकर घर छोड़ देता है. लोककथा में कहा गया है कि करमा के जाते ही क्षेत्र से सुख-समृद्धि भी चली गयी और लोगों की परेशानियां बढ़ने लगीं.

धरमा अपने भाई को खोजने निकलता है. रास्ते में उसे नदी, एक वृद्ध व्यक्ति और एक महिला मिलते हैं. सभी अपनी-अपनी परेशानियां बताते हुए करमा से उनके समाधान का उपाय पूछने का आग्रह करते हैं. आगे चलकर धरमा को करमा तपती गर्मी में परेशान अवस्था में मिलता है. वह उसे घर लौटने के लिए मनाता है. करमा अपनी पत्नी के व्यवहार को लेकर घर लौटने से इनकार करता है, तब धरमा उसे सुधार का भरोसा देता है.

कथा के अनुसार, दोनों भाई वापस लौटते हैं और रास्ते में मिले लोगों को उनके कर्म और उससे जुड़े समाधान बताते हैं. नदी को प्यासे लोगों को साफ पानी देने, जबकि महिला को भूखे व्यक्ति को भोजन कराने का संदेश दिया जाता है. इसके बाद करमा और धरमा घर लौटते हैं और पोखर में करम डाल स्थापित कर पूजा करते हैं. लोकमान्यता है कि इसके बाद क्षेत्र में फिर से खुशहाली लौट आती है.

प्रकृति और भाई-बहन के रिश्ते का पर्व

करमा पर्व में प्रकृति पूजा के साथ भाई-बहन के स्नेह और सामाजिक सहभागिता का भाव भी जुड़ा है. जावा की हरियाली, करम डाल की पूजा और मांदर-नगाड़े की थाप पर सामूहिक नृत्य गांवों में पर्व के सांस्कृतिक स्वरूप को जीवंत करते हैं. करमा-धरमा की लोककथा लोगों को अपने कर्म, प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और दूसरों के प्रति सहयोग का संदेश भी देती है.

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