देवघर : संथालों को आत्मसमर्पण जैसे किसी शब्द का ज्ञान नहीं था, जब तक ड्रम बजता रहता, वे लड़ते रहते थे

Updated at : 22 Dec 2023 1:37 AM (IST)
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देवघर : संथालों को आत्मसमर्पण जैसे किसी शब्द का ज्ञान नहीं था, जब तक ड्रम बजता रहता, वे लड़ते रहते थे

ब्रिटिश हुकूमत को बिहार के भागलपुर और पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के कुछ पहाड़ी इलाके में अपनी शासन व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 22 दिसंबर 1855 में संताल परगना अलग जिला गठन करने को विवश कर दिया.

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देवघर : संताल परगना जिला 22 दिसंबर 1855 में अस्तित्व में आया. तब अंग्रेजों ने एडन एसली को संताल परगना का प्रथम डीसी नियुक्त किया. उन्होंने ही इस जिले की प्रशासनिक व्यवस्था को शुरु किया और संताल परगना के लोगों की जमीन संबंधी समस्याओं के निदान की दिशा में काम किया. आदिवासी लड़ाके थे, लगातार अंग्रेजों से उनकी टक्कर हो रही थी. इसलिए संताल परगना जिले में आम जनता को प्रशासन के करीब लाने के लिए खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य सहित कई सुधारात्मक कार्य शुरू किये गये. सर्वे कर रैयतों के नाम जमीन आवंटन का काम शुरू किया गया. अंग्रेज अफसर मैकफर्सन, हुड और गैंजर के नेतृत्व में सर्वे सेटलमेंट के कार्य को निर्धारित समय के भीतर पूरा करके जमीन पर खेती करने वाले यहां के मूल रैयतों को दस्तावेजी अधिकार दिया गया. संताल हुल ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी। इस कारण ब्रिटिश हुकूमत को बिहार के भागलपुर और पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के कुछ पहाड़ी इलाके में अपनी शासन व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 22 दिसंबर 1855 में संताल परगना अलग जिला गठन करने को विवश कर दिया. 1855 में महाजनों के शोषण और दमन से मुक्ति के लिए सिदो, कान्हू चांद, भैरव, फूलों झानों के नेतृत्व में लगभग 20 हजार से अधिक आदिवासियों की कुर्बानी ने संताल परगना को अलग पहचान दिलायी थी.

अंग्रेजी इतिहासकार हंटर ने भी लिखी वीरता की कहानी

संताल हुल के संबंध में जाने-माने अंग्रेज इतिहासकार हंटर ने अपनी पुस्तक ‘एनल्स ऑफ रूरल बंगाल’ में लिखा है- ‘‘संथालों को आत्मसमर्पण जैसे किसी शब्द का ज्ञान नहीं था. जब तक उनका ड्रम बजता रहता था, वे लड़ते रहते थे. जब तक उनमें से एक भी शेष रहा, वह लड़ता रहा. वहीं ब्रिटिश सेना में एक भी ऐसा सैनिक नहीं था, जो इस साहसपूर्ण बलिदान पर शर्मिंदा न हुआ हो.’’ इस संघर्ष में सिदो और कान्हू के साथ उनके अन्य दो भाई चांद और भैरव भी मारे गये. इस घटना की याद में प्रतिवर्ष 30 जून को ‘हूल दिवस’ मनाया जाता है. कार्ल मार्क्स ने अपनी पुस्तक ‘नोट्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री’ में इस घटना को जनक्रांति की संज्ञा दी है.

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