अब भी सुदूर ग्रामीण इलाकों की बात करें तो पढ़ने-खेलने की उम्र में बच्चियों को परिवार वाले शादी के बंधन में बांध रहे हैं. और तो और इन बच्चियों को शादी का मायने-मतलब भी सही-सही समझ नहीं हो पाता है कि परिजन उन्हें ससुराल तक भेजने के लिये भी मजबूर करते हैं. इसके बाद ऐसी बच्चियां आत्महत्या तक घातक कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं.
ऐसी घटनाओं के बावजूद भी इन बच्चियों को जीने के अधिकार दिलाने के लिये मदद हेतु न ही किसी सामाजिक संस्थान आगे आये हैं और न ही शासन-प्रशासन व सरकार के नुमाइंदे तक को इसकी खबर है. इस हालत में इन बच्चियों को अधिकार दिलाने के लिये राष्ट्रीय व राज्य मानवाधिकार आयोग के भी किसी ने कभी प्रयास नहीं किया है. ऐसे दो मामले तो फिलहाल सामने आये हैं किंतु जिले में सव्रे कराया जाय तो दर्जनों घटनाएं देखने को मिल सकती है. पुत्री होना समाज में अभिशाप कहा जाय या परिजनों की मजबूरी कि लोग पढ़ने-खेलने की उम्र में ही हाथ पीले कराने को बाध्य हैं.

