विश्व मातृभाषा दिवस पर विशेष : मां और मातृभाषा का संबंध नाभि-नाल की तरह
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 21 Feb 2019 9:28 AM
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डॉ उत्तम पीयूष इश्क नशे की तरह मां की बोली , मातृभाषा, मादर ए जुबान हमें दीवाना कर देती है. अचानक पैतृक घर से पांच सौ हजार किलोमीटर दूर कहीं भी अपनी भाषा, अपनी बोली से ऐसे जुड़ जाते हैं जैसे हावड़ा ब्रिज हावड़ा व कोलकाता को जोड़ देती है.. एक इंटरकनेक्शन की तरह भी […]
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डॉ उत्तम पीयूष
इश्क नशे की तरह मां की बोली , मातृभाषा, मादर ए जुबान हमें दीवाना कर देती है. अचानक पैतृक घर से पांच सौ हजार किलोमीटर दूर कहीं भी अपनी भाषा, अपनी बोली से ऐसे जुड़ जाते हैं जैसे हावड़ा ब्रिज हावड़ा व कोलकाता को जोड़ देती है.. एक इंटरकनेक्शन की तरह भी है भाषाओं की दुनिया में.
चलती हुई ट्रेन में ख़ामोश बैठे लोगों के बीच पहले (आज भी थोड़ा स्टाइल बदलकर ) लोगों के बीच पहला संवाद होता था -‘कौऊन जिला घौर बा’ ‘अरे तोहूं भागलपुरे के ?’ भागलपुर कहां? ‘ नाथनगर , अकबरनगर, शाहकुंड,
मधुबनी – खजौली – ठाहर
आरा ..बक्सर..छपरा..
बंगाली को तो बंगाली मिल जाए तो इश्क् ..आर बोलते नेई.
जिला जवार मिल गये तो..आरा जिला घौर बा, कौऊन बात के डौर बा..
देवघरिया या देघरिया का अपना अंदाज़ है -‘ महादेव !’
मन उमका तो चल दुमका का मन दुधानी और टीन बाज़ार में दमकता है…
लोग जानते हैं कि आज हर घर से इंजीनियर्स, डॉक्टर, प्रोफेसर, ऑफिसर और मीडिया वाले निकल रहे हैं.
शुरू में सब समझाते हैं -‘ यू नो. मैंने आइआइटी, एनआइटी निकाला है..ओ के..सुनने वाला पूछता है ‘ रौ बाबू.. गाम कतैय छौ..बस फूट पड़ी मातृभाव की जल धारा…
हम त समस्तीपुर.. शाहपुर पटोरी..मोतिहारी.. मुजफ्फरपुर…
मातृभाषा हमारे व्यक्तित्व का अंतरकक्ष है जहां हम बेनकाब याकि मन से बेलिबास भी रहते हैं. पर हमेशा मन के ड्राइंगरूम में अंग्रेजीनुमा हिंदी बघारनी पड़ती है और आंय बांय शांय बकना सुनना पड़ता है.
पर जरा अपनी माटी की खुशबू में रचा कोई शख्स आकर मस्ती में कहे.. की यौ पीयूष जी..अब कहू मन केहन करैया… तो जो ठहाके चलते हैं वे बयां से बाहर हैं..
मैथिली हो, अंगिका ह़ो,भोजपुरी ह़ो, मगही हो,खोरठा हो,बांग्ला हो, संताली हो -जब अपनी जुबान में हम जीते हैं तो मन का मुरझाया शज़र हरा भरा हो जाता है..
जिस देशज अभियान के बड़े प्रवक्ता महाकवि विद्यापति रहे हैं – वहां से लेकर रामशंकर मिश्र’ पंकज ‘, रामगोपाल रूद्र, सियाराम प्रहरी, डा.अमरेंद्र,भिखारी ठाकुर,रामदयाल मुंडा, बासुदेव बेसरा, डा. डोमन साहु’ समीर’,महाकवि सुमन सुरो, कृष्ण प्रसाद चौधरी तक..सैकडों चिंतकों ने माटी के स्वर को माटी के शब्द दिए..
हर हमेशा अंग्रेज़ी और खड़ियाई हिंदी में सोचते मन को थोड़ा आराम चाहिए और एनर्जी चाहिए तो प्लीज़ अपनी बोली, अपनी भाषा में खुलकर बातें करिए, हंसिये, हंसाइये, रोइये, रूलाइये,गपियाइये…किसी बाम, पेन किलर या दर्द निवारक की जरूरत नहीं पड़ेगी..
मातृभाषा मां का आंचल है उस बच्चे का जिसकी फ़िक्र चाहे दुनिया करे या नहीं पर सांझ ढ़लते ही मां उसे स्नेह से सराबोर कर देती है. मां और मातृभाषा के इस नाभिनाल संबंध को प्रणाम.
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