एक अदद आशियाने को तरस रही सुभाष चंद्र बोस के साथी प्रसन्न मुखर्जी की विधवा
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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आज से 70 साल पहले देश आजाद हुआ था. इस आजादी को पाने के लिए देश के कोने-कोने से क्रांति की चिनगारी फूटी थी. हर खास से लेकर आम तक का कांधा आजादी की लड़ाई में लगा था. इनमें से एक स्वतंत्रता सेनानी प्रसन्न कुमार मुखर्जी भी थे. जिन्होंने सुभाष चंद्र बोस के साथ आजादी […]
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आज से 70 साल पहले देश आजाद हुआ था. इस आजादी को पाने के लिए देश के कोने-कोने से क्रांति की चिनगारी फूटी थी. हर खास से लेकर आम तक का कांधा आजादी की लड़ाई में लगा था. इनमें से एक स्वतंत्रता सेनानी प्रसन्न कुमार मुखर्जी भी थे. जिन्होंने सुभाष चंद्र बोस के साथ आजादी की लड़ाई में अपनी भूमिका निभायी थी. दिसंबर 1992 में लगभग 80 वर्ष की उम्र में जब उनका देहांत हुआ, तब वे दरभंगा में रहा करते थे. उनके देहांत के बाद ही उनके परिवार की स्थिति दयनीय हो गयी. एक स्वतंत्रता सेनानी की विधवा कैसे मुफलिसी में जी रही है, उम्र के अंतिम पड़ाव में कैसे अपना गुजारा कर रही है. स्वतंत्रता दिवस के दिन पेश है एक स्वतंत्रता सेनानी की पत्नी की पीड़ा…
देवघर: स्वतंत्रता सेनानी प्रसन्न कुमार मुखर्जी की विधवा तुलसी मुखर्जी की उम्र करीब 100 वर्ष पहुंच चुकी है. वह पुत्र जय किशोर मुखर्जी व बहु के साथ रहती है. वर्ष 1993-94 में ही पति के देहांत के बाद वह अपने बेटे को लेकर देवघर अा गयी. तब से लेकर आज तक वह यायावर जीवन जी रही है. दिन में बेटी के घर आसरा लेती है और शाम होने के बाद अपने बेटे के पास मारवाड़ी युवा मंच देवघर कार्यालय आ जाती है. जहां उनका बेटा जय किशोर दैनिक मजदूरी पर काम करता है. उसे मंच ने एक कमरा रहने को दिया है. इसी में मां, बेटा व बहु गुजर-बसर कर रहे हैं. पहले बिहार सरकार और अब झारखंड सरकार से गुहार लगाते-लगाते थक चुकी तुलसी की बूढ़ी आंखों में अब निराशा झलक रही है.
आजाद भारत में हैं बेघर
वृद्धा तुलसी कहती हैं कि स्वतंत्रता की लड़ाई में उनके पति ने सुभाष चंद्र बोस के साथ काम किया. आजाद हिंद फौज में भी वे रहे. पुलिस की वरदी में आजादी से पूर्व कई लड़ाइयां लड़ी. सिंगापुर भी गये थे. लेकिन तब उन्हें क्या पता था कि आजादी के बाद अपने देश में उन्हें एक आशियाने के लिए भी तरसना पड़ेगा. उन्होंने बताया कि जब तक वे जीवित थे, किसी तरह गुजर-बसर हो रहा था. उनके जाने के बाद बेआसरा हो गये. एक बेटा है, पढ़ा-लिखा है लेकिन बेरोजगार है. आज भी बेघर हैं. न रहने को जमीन है और न ही सरकारी आवास ही मिला है. हर स्वतंत्रता दिवस पर प्रशासन सम्मान तो देता है लेकिन कई बार लिखे, एक अदद सरकारी आवास नहीं देता.
विधवा ने मांगा सम्मान
वृद्धा तुलसी लड़खड़ाती हुई आवाज में कहती है कि अब उनकी अंतिम इच्छा है कि एक स्वतंत्रता सेनानी की विधवा की अरथी उसके अपने घर से उठे.
उन्होंने मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन से एक अदद सरकारी आवास या कम से कम एक झोपड़ी बनाने लायक जमीन देने का आग्रह किया है.
1972 में मिला था ताम्र पत्र
स्वतंत्रता सेनानी के पुत्र जय किशोर कहते हैं कि उनके पिता को 1972 में स्वतंत्रता के 25वें वर्ष पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी स्वतंत्रता की लड़ाई में अहम योगदान के लिए ताम्र पत्र देकर सम्मानित किया था. वे मारवाड़ी युवा मंच में 3500 रुपये मानदेय पर गुजारा कर रहे हैं. सरकार से मांग करते हैं कि सरकारी नौकरी दी जाये.
- स्वतंत्रता सेनानी प्रसन्न कुमार मुखर्जी का 1992 में हो गया था देहांत
- तब वे एकीकृत बिहार के दरभंगा में रहा करते थे
- पति के देहांत के बाद एक बेटा व बेटी को लेकर देवघर आ गयी तुलसी मुखर्जी
- मारवाड़ी युवा मंच कार्यालय में दैनिक मजदूर है बेटा
- रहने के लिए न घर है और न जमीन
- बेटी के घर जीवन के अंतिम समय काट रही स्वतंत्रता सेनानी की वृद्ध पत्नी
- मुख्यमंत्री से मांगी सरकारी आवास या झोपड़ी बनाने के लिए जमीन
- स्वतंत्रता दिवस पर स्वंतत्रता सेनानी की विधवा ने मांगा सम्मान
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