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सदियों से चली आ रही परंपरा आज भी कायम, एक ही गांव में कई श्मशान घाट

पूर्वजों की परंपरा आज भी कायम है.

: विभिन्न जातियों के शवों को जलाने के लिए अलग-अलग श्मशान घाट पिंटू कुमार राणा मयूरहंड. प्रखंड का करमा एक ऐसा गांव है, जहां सदियों से चली आ रही पूर्वजों की परंपरा आज भी कायम है. विभिन्न जातियों के शवों (अर्थियों) को जलाने व दफनाने के लिए अलग-अलग स्थानों में श्मशान घाट (मुक्तिधाम) है. दंदाहा घाटी के समीप अलग-अलग स्थान पर बनियां (केसरी), ठाकुर व सोनार, दंदाहा नाला के अंदुरवा घाट पर यादव, तेलिया बांध में बढ़ई व तेली साव, दबदबा जंगल में बिरहोर, भुसाही नदी घाट पर भुईयां, नया तालाब के पास रविदास, भुसाही नदी के हेठ बेला घाट पर जायसवाल, बाघिनियां घोघरा में पासवान, ढोढ़ी गांव में लोहार जाति के शवों को जलाया व दफनाया जाता है. गांव में दो श्राद्धकर्म स्थल है. नया तालाब पर भुईयां व रविदास व अन्य सभी जातियों के लिए पुराना तालाब पर श्राद्ध कार्य कराये जातें हैं. गांव में एक स्थान पर श्मशान घाट व श्राद्ध कर्म स्थल नही होने के कारण बाहर से आने वाले लोगों को परेशानी होती है. एक ही स्थल पर होता, तो श्मशान घाट का विकास होता, सुविधाएं बढ़ती. श्मशान घाटों तक जाने के लिए न तो सड़क है, न ही पेयजल की व्यवस्था. परंपरा में है सुधार की जरूरत: ग्रामीण सेवा यादव ने कहा कि गांव में पूर्वजों की परंपरा कायम है. इस परंपरा में अब सुधार की जरूरत है. मनोज ठाकुर ने कहा कि एक श्मशान घाट होना चाहिए, ताकि आने वाले लोगों को परेशानी नहीं हो. कृष्ण केसरी ने कहा कि पूर्वजों की परंपरा में बदलाव होना चाहिए. बदलाव होने से सुविधा बढ़ेगी. मनोज यादव ने कहा कि परंपरा में सुधार की जरूरत है. एक घाट होने से श्मशान घाट को विकसित किया जा सकता है.

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