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Chaibasa News : अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है हजयात्रा

Updated at : 03 Jun 2025 11:03 PM (IST)
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Chaibasa News : अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है हजयात्रा

5 से 9 जून तक इस वर्ष हज के अरकान को पूरा किया जायेगा

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चक्रधरपुर. 5 से 9 जून तक इस वर्ष हज के अरकान को पूरा किया जायेगा. करोड़ों लोग दुनिया भर से हज करने के लिए अरब का मक्का शहर पहुंच चुके हैं. हज हर उस मोमिन पर फर्ज है, जिसकी आर्थिक स्थिति अच्छी है. हज इस्लाम के पांच स्तंभों में एक है. हर उस मुसलमान पर फर्ज है जो शारीरिक और आर्थिक रूप से सक्षम हैं. यह एक बार जीवन में करना अनिवार्य होता है. हज अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक है. यह आत्मा की शुद्धि और पापों की माफी का माध्यम है. हज में अमीर-गरीब, राजा-रंक सभी एक समान कपड़ों (एहराम) में रहते हैं. इससे इस्लाम का भाईचारा और समानता का संदेश मिलता है. हज हजरत इब्राहिम (अ.), हजरत इस्माइल (अ.) और हजरत हाजरा (रजि.) की कुर्बानियों और अल्लाह की आजमाइशों को याद दिलाता है. हज का उद्देश्य अल्लाह की इबादत और रजा हासिल करना है. तकवा (परहेजगारी) और सब्र को अपनाने का बेहतर माध्यम है. हज से कुर्बानी, समर्पण और त्याग का भाव जागृत होता है. हज एक संपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा है.

हज के पांच दिनों के अरकान.

8 जिलहिज्जा (यौम-ए-तरविया) :

इस दिन एहराम बांधना पड़ता है. मक्का या मीकात से एहराम बांधकर हज की नीयत की जाती है. इसके बाद हाजी मिना जाते हैं. वहां पांच वक्त की नमाज अदा करते हैं.

9 जिलहिज्जा (यौम-ए-अराफा) :

यह हज का सबसे महत्वपूर्ण दिन है. हाजी अराफात के मैदान में ठहरते हैं और दुआ करते हैं. मस्जिदे नमिरा में इमाम हज का खुत्बा देते हैं, जिसे हाजी सुनते हैं. यहां जोहर और अस्र की नमाज एक साथ पढ़ी जाती है. मस्जिदे नमीरा में ठहराव (वकूफ अराफात) हज का रुक्ने अजीम (बड़ा काम) है. मगरिब के बाद अराफात से मुजदलिफा जाकर रात गुजारना और वहां मगरिब व ईशा की नमाज पढ़ना होती है.

10 जिलहिज्जा (यौम-ए-नहर) :

इस दिन रमी जमरात का अमल होता है. यिसमें शैतान को प्रतीकात्मक पत्थर मारा जाता है. सबसे बड़े जमरा को 7 कंकर मारा जाता है. इस दिन ही हजरत इब्राहिम (अ.) की कुर्बानी की याद में जानवर की कुर्बानी की जाती है. इसके बाद सर मुंडवाया या बाल कटवाया जाता है. जिसे हलक या कसर कहा जाता है. पुरुष सर मुंडवाते हैं और महिलाएं बाल कटवाती हैं. इसके बाद एहराम खोल दिया जाता है जिसे तहल्लुल कहते हैं. इसके बाद हाजी सामान्य वस्त्र पहन सकते हैं. इस अमल के बाद तवाफे जियारत अर्थात काबा शरीफ का तवाफ करना फर्ज है.

11 जिलहिज्जा :

रमी जमरात के दौरान तीनों जमरात (छोटा, मंझला, बड़ा) को 7-7 कंकर मारा जाता है. मिना में रात गुजारना पड़ता है.

12 जिलहिज्जा :

फिर से तीनों जमरात की रमी यानी पत्थर मारा जाता है. इसके बाद हाजी चाहें तो मक्का लौट सकते हैं या एक और दिन 13 जिलहिज्जा मिना में रह सकते हैं. हज के अंत में तवाफे विदा यानी विदाई तवाफ होता है. मक्का छोड़ने से पहले काबा का आखिरी तवाफ करना पड़ता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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ATUL PATHAK

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By ATUL PATHAK

ATUL PATHAK is a contributor at Prabhat Khabar.

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