Hormuz Crisis: कैप्टन राकेश रंजन का शव दुबई से लाने की कोशिश तेज, रक्षा राज्यमंत्री ने विदेश मंत्रालय से किया संपर्क

Published by :KumarVishwat Sen
Published at :21 Mar 2026 1:20 PM (IST)
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Hormuz Crisis

रांची के अरगोड़ा स्थित वसुंधरा अपार्टमेंट में चर्चा करते कैप्टन राकेश रंजन के परिजन. फोटो: प्रभात खबर

Hormuz Crisis: स्टेट ऑफ होर्मुज में फंसे शिप के कैप्टन राकेश रंजन सिंह का दुबई में निधन हो गया. शव को भारत लाने की प्रक्रिया तेज हुई है. रक्षा राज्यमंत्री ने विदेश मंत्रालय से संपर्क किया है. परिवार ने आर्थिक सहायता और जल्द पार्थिव शरीर लाने की मांग की है, जिससे राहत मिल सके. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.

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रांची से प्रणब की रिपोर्ट

Hormuz Crisis: स्टेट ऑफ होर्मुज में फंसे शिप ‘अवाना’ के कैप्टन राकेश रंजन सिंह (47 वर्ष) का शव दुबई से भारत लाने की कोशिशें अब तेज हो गई हैं. इस मामले में रक्षा राज्यमंत्री संजय सेठ ने विदेश मंत्रालय से संपर्क साधा है. यह पहल कैप्टन के बड़े बेटे प्रवर सिंह (20 वर्ष) द्वारा लिखे गए पत्र के बाद की गई, जिसमें उन्होंने सरकार से हस्तक्षेप की मांग की थी. मंत्री के हस्तक्षेप के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि पार्थिव शरीर जल्द भारत लाया जा सकेगा.

हृदयाघात से हुआ निधन, दुबई में रखा है शव

जानकारी के अनुसार, 18 मार्च को कैप्टन राकेश रंजन सिंह का हृदयाघात से निधन हो गया था. उस समय उनका जहाज ‘अवाना’ स्टेट ऑफ होर्मुज के समुद्री क्षेत्र में फंसा हुआ था. उनका पार्थिव शरीर फिलहाल दुबई के पोर्ट शेख राशिद अस्पताल की मोर्चरी में रखा गया है. तीन दिन बीत जाने के बावजूद शव के भारत नहीं पहुंचने से परिवार गहरे सदमे में है.

परिवार का रो-रोकर बुरा हाल

रांची के अरगोड़ा स्थित वसुंधरा अपार्टमेंट में कैप्टन की पत्नी रंजू कुमारी का रो-रोकर बुरा हाल है. उनका छोटा बेटा अधीश प्रताप सिंह (15 वर्ष) भी पिता को याद कर लगातार भावुक हो रहा है. वहीं बड़ा बेटा प्रवर सिंह, जो बेंगलुरु में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है, इस दुखद खबर के बाद रांची पहुंच गया है. परिवार की स्थिति बेहद दयनीय और भावनात्मक रूप से टूट चुकी है.

बेटे ने लिखा पत्र, मांगी सरकारी मदद

कैप्टन के बड़े बेटे प्रवर सिंह ने रक्षा राज्यमंत्री संजय सेठ को पत्र लिखकर भारत सरकार से मदद की गुहार लगाई है. उन्होंने पत्र में अनुरोध किया है कि उनके पिता के पार्थिव शरीर को जल्द से जल्द भारत लाने की प्रक्रिया तेज की जाए. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनके पिता परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे, ऐसे में परिवार पर आर्थिक संकट गहरा गया है. उन्होंने सरकार से आर्थिक सहायता देने की भी मांग की है.

युद्ध के कारण फंसा जहाज, नहीं मिल सकी मदद

कैप्टन राकेश रंजन सिंह का जहाज दुबई पोर्ट से तेल लोड कर भारत के लिए रवाना हुआ था. जहाज करीब 60 किलोमीटर समुद्र में ही आगे बढ़ पाया था कि ईरान-इजरायल के बीच युद्ध शुरू हो गया. इसके बाद ईरान ने होर्मुज की खाड़ी को बंद कर दिया, जिससे जहाज वहीं फंस गया. इसी दौरान कैप्टन की तबीयत अचानक बिगड़ गई.

एयर एंबुलेंस नहीं मिली, देर से पहुंची मदद

जब कैप्टन की तबीयत खराब हुई, तो जहाज के अन्य अधिकारियों ने दुबई एयरपोर्ट के एटीसी से एयर एंबुलेंस की मांग की. लेकिन युद्ध जैसी आपात स्थिति के कारण एटीसी ने इसकी अनुमति नहीं दी. इसके बाद कैप्टन को बोट के जरिए दुबई पोर्ट लाया गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी और उनकी जान नहीं बचाई जा सकी.

बिहार से पहुंचे परिजन, अंतिम संस्कार की तैयारी

कैप्टन राकेश रंजन सिंह का पैतृक घर बिहार के नालंदा जिले के बिहारशरीफ में है. घटना की जानकारी मिलने के बाद वहां से परिजन रांची पहुंच चुके हैं. सभी परिजनों की इच्छा है कि शव जल्द से जल्द भारत लाया जाए, ताकि उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक स्थान पर पूरे सम्मान के साथ किया जा सके.

सरकार से त्वरित कार्रवाई की उम्मीद

परिवार और स्थानीय लोगों ने केंद्र सरकार से इस मामले में त्वरित कार्रवाई की मांग की है. उनका कहना है कि शव को भारत लाने की प्रक्रिया शुरू तो हो चुकी है, लेकिन इसमें हो रही देरी से उन्हें मानसिक और भावनात्मक पीड़ा झेलनी पड़ रही है. ऐसे में जरूरी है कि संबंधित विभाग तेजी से कार्रवाई करें.

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मानवता और संवेदनशीलता की परीक्षा

यह मामला केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि सरकार और प्रशासन की संवेदनशीलता की भी परीक्षा है. एक भारतीय नागरिक, जो अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए विदेश में था, उसके पार्थिव शरीर को सम्मानपूर्वक देश लाना सरकार की जिम्मेदारी है. अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि कब तक कैप्टन राकेश रंजन सिंह का पार्थिव शरीर भारत पहुंचता है और परिवार को राहत मिलती है.

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लेखक के बारे में

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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