बोकारो के लुगुबुरु में संथाल सरना धर्म महासम्मेलन कल से, सीएम हेमंत भी होंगे शामिल, जानें इस स्थान की विशेषता
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 17 Nov 2021 12:41 PM
बोकारो के लुगुबुरु में दो दिवसीय 21वां अंतर्राष्ट्रीय संथाल सरना धर्म महासम्मेलन कल से शुरू हो रहा है. 19 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा पर पूजा-अर्चना के साथ मुख्य कार्यक्रम होगा. समिति के मुताबिक, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पूजा-अर्चना में शामिल होंगे.
Jharkhand News, Bokaro News ( राकेश वर्मा/रामदुलार पंडा ), बेरमो/महुआटांड़ बोकारो : बोकारो जिले के ललपनिया स्थित लुगुबुरु घांटाबाड़ी धोरोमगाढ़ संतालियों की धार्मिक, सामाजिक व सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है. ऐसी मान्यता है कि हजारों-लाखों वर्ष पूर्व इसी स्थान पर लुगु बाबा की अध्यक्षता में संथालियों का जन्म से लेकर मृत्यु तक का रीति-रिवाज यानी संथाली संविधान की रचना हुई थी. यही वजह है कि लुगुबुरु घांटाबाड़ी देश-विदेश में निवास कर रहे हर एक संतालियों के लिए गहरी आस्था का केंद्र है और उनके गौरवशाली अतीत से जुड़ा महान धर्मस्थल है.
हर अनुष्ठान में संताली समुदाय के लोग लुगुबुरु का बखान करते हैं. अगर ये कहा जाए कि लुगुबुरु संतालियों की संस्कृति, परंपरा का उद्गम स्थल है तो गलत नहीं होगा. विभिन्न प्रदेशों से श्रद्धालु यहां पहुंचते ही धन्य हो जाते हैं, जो उनके चेहरे पर साफ साफ देखा जा सकता है. लुगुबुरु मार्ग में ऐसे कई चट्टानें हैं, जहां से श्रद्धालु चट्टानों को खरोंच कर अवशेष अपने साथ ले जाते हैं. इससे संतालियों की लुगुबुरु के प्रति आस्था व विश्वास को समझा जा सकता है.
संथाली जानकारों के मुताबिक, लाखों वर्ष पहले दरबार चट्टानी में बाबा लुगुबुरु की अध्यक्षता में संथालियों की 12 साल तक मैराथन बैठक हुई. हालांकि, संथाली गीत में एक जगह गेलबार सिइंया, गेलबार इंदा यानी 12 दिन, 12 रात का भी जिक्र आता है. जिसके बाद संथालियों की गौरवशाली संस्कृति की रचना संपन्न हुई. इतने लंबे समय तक चली इस बैठक के दौरान संथालियों ने इसी स्थान पर फसल उगायी और धान कूटने के लिए चट्टानों का प्रयोग किया.
जिसके चिन्ह आज भी आधा दर्जन उखल के स्वरूप में यहां मौजूद हैं. इसके बगल से बहने वाली पवित्र सीता नाला का प्रयोग पेयजल के रूप में किया जाता है. यह नाला पानी करीब 40 फिट नीचे गिरती है, संथाली इसे सीता झरना कहते हैं इसके अलावा यह झरना के नाम से भी काफी प्रसिद्ध है. संथाली लोग इस जल को गाय के दूध समान पवित्र मानते हैं. ऐसी मान्यता है कि इस जल के सेवन से कब्जियत, गैस्टिक व चरम रोग जैसी बिमारियां दूर हो जाती है.
झरना के निकट एक गुफा है, संथाली इसे लुगु बाबा का छटका कहते हैं. मान्यता के अनुसार, लुगुबुरु यहीं पर स्नान करते थे और इसी गुफा के जरिये वे सात किमी ऊपर स्थित घिरी दोलान(गुफा) के लिए आते जाते थे. कहा जाता है कि लुगुबुरु के सच्चे भक्त इस गुफा के जरिये ऊपर गुफा तक पहुंच जाते थे.
इस स्थान पर एक लंबे समय तक बैठक हुई इसलिए यहां के चट्टानों को संथालियों ने दोरबार चट्टानी कहा और आज भी कहा जाता है.
संथालियों द्वारा की जाने वाली दशांय नृत्य (गुरु चेला नृत्य) के दौरान गाये जाने वाले लोकगीत हो या विवाह, चाहे कोई भी छोटा-बड़ा अनुष्ठान ही क्यों न हो, हर अनुष्ठान में लुगुबुरु घांटा बाड़ी की अराधना व उपासना की जाती है.
दरबार चट्टानी स्थित पुनाय थान(मंदिर) में सबसे पहले मरांग बुरु और फिर लुगुबुरु, लुगु आयो, घांटाबाड़ी गो बाबा, कुड़ीकीन बुरु, कपसा बाबा, बीरा गोसाईं की पूजा की जाती है.
ऐसे तो लुगुबुरु लाखों वर्षों से संथालियों के लिए गहरी आस्था का केंद्र रहा है. इस क्षेत्र से निकलकर आज यहां के संथाली विभिन्न प्रदेशों विस्तार हुए हैं. सोहराय कुनामी (कार्तिक पूर्णिमा) के दिन हजारो लोग यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते रहे थे.
लेकिन अपने वजूद के संरक्षण, विकास व श्रद्धालुओं की सुविधा को स्थानीय बुद्धिजीवी संताली बबुली सोरेन व लोबिन मुर्मू ने अपने साथियों के साथ मिलकर झारखंड सहित विभिन्न प्रदेशों और बांग्लादेश तक में जबरदस्त प्रचार-प्रसार किया और आज आलम ये है कि 2001 में आयोजित सम्मेलन में 30 गुणा 30 के पंडाल से शुरू हुआ 600 गुणा 200 के पंडाल में पहुंच चुका है और लाखों की संख्या में देश-विदेश से श्रद्धालु यहां अपने गौरवशाली अतीत से रूबरू होने आते हैं. पूरी सिद्दत से लुगुबुरु की पूजा करते हैं.
आज इसे राजकीय महोत्सव का दर्जा भी प्राप्त हो चुका है. लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण 2020 में सम्मेलन आयोजित नहीं हो सका. इस वर्ष भी पूजा-अर्चना आयोजित हो रहा है लेकिन इसकी भव्यता पिछले साल के मुकाबले खास है.
Posted By : Sameer Oraon
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