VIDEO: ग्लेशियर से हाई डैम तक, नेपाल की तबाही ने बिहार के लिए क्यों बजाई खतरे की घंटी?
नेपाल में 6 अगस्त 2026 को आई भोटे कोशी नदी की विनाशकारी बाढ़ ने सैकड़ों जानें लील लीं. यह घटना हिमालयी पारिस्थितिकी और विकास के मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े करती है, खासकर बिहार के लिए. यह बाढ़ भूकंप से नहीं, बल्कि ग्लेशियर के मलबे के टूटने से आई. पहाड़ों में अंधाधुंध विकास ने जोखिम को बढ़ाया है. सप्तकोशी हाई डैम जैसे समाधानों पर भी सवाल उठ रहे हैं. ऐसे में क्लाइमेट रेसिलिएंट डेवलपमेंट की सख्त जरूरत है. देखें वीडियो...
Nepal Flood: 26 अगस्त 2026 को नेपाल-तिब्बत सीमा पर भोटे कोशी नदी क्षेत्र में आई अचानक बाढ़ ने एक बार फिर हिमालयी पारिस्थितिकी और विकास के मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इस भयावह घटना में 150 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों लोग लापता हैं.
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भूकंप नहीं, ग्लेशियर का मलबा बना तबाही का कारण
शुरुआती रिपोर्टों में इस तबाही की वजह भूकंप मानी जा रही थी, लेकिन यूएसजीएस (USGS) के वैज्ञानिक विश्लेषण ने तस्वीर साफ कर दी. वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग 5,200 मीटर की ऊंचाई पर ग्लेशियर का हिस्सा टूटा और मलबे का प्रवाह (Glacial Collapse & Debris Flow) तेजी से नीचे आया. ICIMOD के अध्ययनों के मुताबिक, 2011 से 2020 के बीच हिंदू कुश हिमालय में ग्लेशियर पिघलने की दर पिछले दशक की तुलना में 65% तेज रही है. जब ये बर्फ और चट्टानें टूटती हैं, तो नीचे की ओर मलबा एक विनाशकारी दीवार की तरह बढ़ता है.
विकास की अंधी दौड़ और हिमालयी अस्थिरता
पहाड़ों में बन रही सुरंगें, हाईवे, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और नदी तटों पर अतिक्रमण ने प्राकृतिक जोखिम को मानवीय आपदा में बदल दिया है. खतरा केवल प्रकृति की हलचल से नहीं, बल्कि फ्लड प्लेन (बाढ़ के मैदानों) में खड़े किए गए इंफ्रास्ट्रक्चर से बढ़ा है. जहां कभी नदियां बहती थीं, वहां अब शहर और कमर्शियल हब बस चुके हैं.
सप्तकोशी हाई डैम: समाधान या नई चुनौती?
नेपाल की इस त्रासदी का सीधा असर बिहार पर पड़ता है. बिहार दशकों से सप्तकोशी हाई डैम की मांग करता रहा है, ताकि बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और बिजली उत्पादन हो सके. लेकिन स्थानीय लोगों का विस्थापन, पुराने मुआवजे के विवाद और उच्च भूकंपीय संवेदनशीलता इस योजना के रास्ते में बड़ी दीवार बने हुए हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि हाई डैम भी हर प्रकार की बाढ़ या भूस्खलन को पूरी तरह रोकने का अकेला समाधान नहीं है.
क्लाइमेट रेसिलिएंट डेवलपमेंट की सख्त जरूरत
नेपाल की नदियां बिहार की जीवन रेखा भी हैं और बाढ़ की चुनौती भी. इसलिए भारत और नेपाल के बीच जल सहयोग केवल कूटनीतिक वार्ताओं तक सीमित न रहकर रियल-टाइम डेटा शेयरिंग, सैटेलाइट मॉनिटरिंग और अर्ली वार्निंग सिस्टम पर आधारित होना चाहिए. विकास प्रकृति को नजरअंदाज करके नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलन बनाकर ही टिकाऊ रह सकता है.
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