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गांवों से शहर तक में गूंजने लगी सामा-चकेवा की गीत: मिट्टी की मूर्तियों और लोक परंपरा से सजी संस्कृति की अनूठी झलक

Updated at : 04 Nov 2025 5:46 PM (IST)
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गांवों से शहर तक में गूंजने लगी सामा-चकेवा की गीत: मिट्टी की मूर्तियों और लोक परंपरा से सजी संस्कृति की अनूठी झलक

मिथिला की संस्कृति को शारदा सिन्हा ने गीत के माध्यम से है परोसा

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– सामा-चकेवा आज, घरों में गुंजने लगी सोहर व समदाउन सुपौल. मिथिलांचल की धरती पर आज भी पुरानी संस्कृति और सभ्यता की झलक जीवंत है. लोक परंपराओं को सहेजने और आगे बढ़ाने में यहां की महिलाएं हमेशा अग्रणी रहती हैं. इसी कड़ी में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर मनाया जाने वाला सामा-चकेवा पर्व बुधवार पांच नवंबर को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा. यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम, स्नेह और पारिवारिक सौहार्द का प्रतीक माना जाता है. त्योहार की तैयारी में इस समय गांव-गांव का माहौल पूरी तरह पारंपरिक रंग में रंगा हुआ है. महिलाएं और बालिकाएं मिट्टी से सामा, चकेवा, खंजन चिड़िया, सतभैया, ढोलकिया, सखारी, भंवरा-भंवरी, वृंदावन, कचबचिया और चुगला जैसी प्रतिमाएं बनाकर उन्हें रंग-रोगन और सजाने में व्यस्त हैं. इन रंगीन मूर्तियों के माध्यम से मिथिला की कलात्मकता और लोकभावना झलकती है. कार्तिक पूर्णिमा की रात महिलाएं बांस के बने चंगेरा में सामा-चकेवा को सिर पर उठाकर पारंपरिक गीत गाते हुए घर से बाहर खुले मैदान या आंगन में जाती हैं. वहां पूजा-अर्चना कर भाई की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और कुशलता की कामना की जाती है. परंपरा के अनुसार भाई चुगला के पुतले को जलाकर वृंदावन में लगी प्रतीकात्मक आग को बुझाता है जो भाई-बहन के रिश्ते की पवित्रता और एकता का प्रतीक माना जाता है. महिलाएं इस अवसर पर पारंपरिक लोकगीतों “सामचक-सामचक अइयह हो, जोतला खेत में ढेपा फोरि-फोरि खैयह हो” और “सामा खेलेय गेलिये हो, भईया चकेवा लय गेल चोर” के माध्यम से अपने भावों को व्यक्त करती हैं. यह लोकसंगीत न केवल भाई के प्रति बहन के प्रेम को दर्शाता है, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक गहराई को भी उजागर करता है. अस्सी वर्षीय प्रेमा देवी बताती हैं कि “यह पर्व बेहद प्राचीन परंपरा है. सामा को बेटी के रूप में घर भरी की जाती है, जिससे घर-परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है.” मिथिला की संस्कृति को शारदा सिन्हा ने गीत के माध्यम से है परोसा मिथिला के इस अनोखे लोक पर्व को लोकप्रिय बनाने में पद्मश्री शारदा सिन्हा का योगदान भी अमूल्य रहा है. उन्होंने अपने मधुर स्वरों में “चुगला बड़ अकान छै, भैया बड़ विद्वान छै, चुगला मुंह में चुन तमाकू, भैया मुंह में पान” जैसे गीतों के माध्यम से मिथिला की संस्कृति को जीवंत किया है. शारदा सिन्हा ने अपने गीतों से न केवल लोक परंपरा को जीवंत रखा, बल्कि प्रवासी पक्षियों के संरक्षण का संदेश भी दिया। उन्होंने अपने गीत “नदिया के तीरे तीरे फला भैया खेलथिन शिकार” के जरिए लोगों को पक्षियों के शिकार से बचने की प्रेरणा दी है. छठ पर्व के बाद मिथिला के जलाशयों में बड़ी संख्या में प्रवासी पक्षियों का आगमन होता है. सामा-चकेवा पर्व इस प्राकृतिक सुंदरता और लोक संस्कृति का संगम बन जाता है जहां लोकगीत, लोककला और पर्यावरण संरक्षण का संदेश एक साथ गूंजता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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RAJEEV KUMAR JHA

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By RAJEEV KUMAR JHA

RAJEEV KUMAR JHA is a contributor at Prabhat Khabar.

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