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जुड़ शीतल कल, मिथिला की संस्कृति, प्रकृति व परंपरा का पर्व है

Updated at : 13 Apr 2025 6:32 PM (IST)
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जुड़ शीतल कल, मिथिला की संस्कृति, प्रकृति व परंपरा का पर्व है

जुड़ शीतल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ जुड़ने और जीवन में संतुलन बनाए रखने की है सांस्कृतिक परंपरा

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– जुड़ शीतल केवल एक पर्व नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ जुड़ने और जीवन में संतुलन बनाए रखने की है सांस्कृतिक परंपरा सुपौल. मिथिला की धरती पर प्रकृति प्रेम और सांस्कृतिक विरासत का अनोखा उत्सव जुड़ शीतल पर्व मिथिला की संस्कृति का प्रतीक है. यह पर्व न केवल मानवीय जीवन में शीतलता और स्नेह का संचार करता है, बल्कि पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों की सेवा का संदेश भी देता है. मिथिला की लोकसंस्कृति में यह पर्व पर्यावरण संरक्षण की अनूठी परंपरा को दर्शाता है. जुड़ शीतल से एक दिन पूर्व सतुआनी पर्व मनाया जाता है. जो सोमवार को मनाया जायेगा. जबकि मंगलवार को जुड़ शीतल पर्व मनाया जायेगा. सतुआनी पर्व में लोग बेसन और सत्तू से बने व्यंजन ग्रहण करते हैं. परंपरा के अनुसार, जुड़ शीतल के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता, ताकि वातावरण के ताप को नियंत्रित रखा जा सके. सतुआनी के दिन बना शुद्ध व ठंडा भोजन ही अगले दिन उपयोग में लाया जाता है, जिससे ऊर्जा की बचत भी होती है. पर्व के दिन घर के बड़े-बुजुर्ग छोटे सदस्यों के सिर पर चुल्लू भर पानी डालकर ‘जुड़ायल रहु’ का आशीर्वाद देते हैं. यह जल सिर पर डालने की परंपरा सिर्फ एक धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि भीषण गर्मी में शारीरिक शीतलता प्रदान करने का प्रतीक भी है. सुबह होते ही लोग पेड़-पौधों की जड़ों में पानी डालते हैं और उनके आसपास सफाई करते हैं. इससे न सिर्फ पर्यावरण की रक्षा होती है, बल्कि भावी पीढ़ी को प्रकृति से जुड़ने की प्रेरणा भी मिलती है. पंडित सन्नी झा बताते हैं कि इस दिन पितरों की स्मृति में समाधि स्थलों पर छिद्रयुक्त मिट्टी के पात्र से जल अर्पित करने की परंपरा है, जिससे लगातार जल प्रवाह बना रहता है. बदलते मौसम में जीवन जीने की सीख गर्मी की शुरुआत के इस दौर में जुड़ शीतल पर्व न केवल हमारी परंपराओं को जीवंत करता है, बल्कि जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलन की सीख भी देता है. बुजुर्ग बेबी देवी कहती हैं, “विवाह के बाद से ससुराल में यह पर्व मनाते आ रही हूं. यह पर्व घर-परिवार में प्रेम और अपनत्व का भाव बढ़ाता है. वहीं ममता देवी बताती हैं, बचपन में जैसे हमारे माता-पिता हमें जल डालकर आशीर्वाद देते थे, आज हम वह परंपरा अपने बच्चों के साथ निभा रहे हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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RAJEEV KUMAR JHA

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By RAJEEV KUMAR JHA

RAJEEV KUMAR JHA is a contributor at Prabhat Khabar.

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