तिरंगा लेकर पैदल सीवान से चंपारण पहुंचते थे ये लोग, रेशमी रूमाल पर लिखकर अंग्रेजों के खिलाफ चलाया था अभियान

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फ्रीडम फाइटर हाफिज शम्सुल जोहा फाइल फोटो

Hafiz Shamsul Zoha : हाफिज शम्सुल जोहा और मिर्जा शौकत अली जैसे गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों ने तहरीक-ए-रेशमी रुमाल के माध्यम से अंग्रेजों के खिलाफ गुप्त अभियान चलाए. उनकी अनकही बहादुरी की कहानी पढ़ें.

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Hafiz Shamsul Zoha : भारत की आजादी की कहानी केवल बड़े नेताओं और चर्चित क्रांतिकारियों तक सीमित नहीं है. इस संघर्ष को मजबूत बनाने में गांव-कस्बों के उन अनगिनत लोगों की भी भूमिका रही, जिन्होंने बिना किसी प्रसिद्धि की चाह के अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई. सीवान के बड़हरिया प्रखंड के माधोपुर निवासी हाफिज शम्सुल जोहा और मिर्जा शौकत अली भी ऐसे ही गुमनाम सेनानियों में शामिल रहे.

तहरीक-ए-रेशमी रुमाल से जुड़े थे दोनों सेनानी

बताया जाता है कि हाफिज शम्सुल जोहा और मिर्जा शौकत अली तहरीक-ए-रेशमी रुमाल से जुड़े रहे. इस आंदोलन में गुप्त संदेशों के जरिए अंग्रेजी शासन के खिलाफ गतिविधियों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाता था. संदेशों को रेशमी कपड़ों पर लिखकर अलग-अलग स्थानों और मदरसों तक पहुंचाया जाता था, ताकि अंग्रेजी हुकूमत की निगरानी से बचा जा सके.

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मदरसे से जुड़कर चलाते थे गुप्त अभियान

माधोपुर स्थित मदरसा अनवारुल इस्लाम में शिक्षक रहे हाफिज शम्सुल जोहा शिक्षा देने के साथ स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े रहे. वह अंग्रेजी शासन की नीतियों का विरोध अपने तरीके से करते थे. इस अभियान में मिर्जा शौकत अली भी उनका साथ देते थे. दोनों के भीतर देश को अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराने का जुनून था.

देवबंद के आंदोलन से भी जुड़ा था रेशमी रुमाल अभियान

तहरीक-ए-रेशमी रुमाल का संबंध देवबंद से जुड़े स्वतंत्रता आंदोलन से भी रहा. अंग्रेजी सरकार की कड़ी निगरानी के दौर में आंदोलनकारियों के बीच गुप्त संदेश पहुंचाने के लिए इस तरह के पत्राचार का इस्तेमाल किया जाता था. इससे अलग-अलग स्थानों पर सक्रिय लोगों के बीच संपर्क बनाए रखने में मदद मिलती थी.

गांधीजी का भाषण सुनने पैदल निकल पड़ते थे

हाफिज शम्सुल जोहा और मिर्जा शौकत अली की स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति प्रतिबद्धता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महात्मा गांधी के किसी इलाके में पहुंचने की सूचना मिलते ही दोनों तिरंगा लेकर पैदल निकल पड़ते थे. उनका उद्देश्य गांधीजी का भाषण सुनना और उनके विचारों को दूसरे लोगों तक पहुंचाना था.

फ्रीडम फाइटर हाफिज शम्सुल जोहा और मिर्जा शौकत अली | Prabhat Khabar Network
मिर्जा शौकत अली की फाइल फोटो

चंपारण तक पैदल पहुंचे थे दोनों सेनानी

गांव के बुजुर्गों के अनुसार, जब महात्मा गांधी किसानों की समस्याओं को समझने और आंदोलन को दिशा देने के लिए चंपारण पहुंचे थे, तब हाफिज शम्सुल जोहा और मिर्जा शौकत अली भी माधोपुर से पैदल चंपारण पहुंचे थे. आजादी की चाह इतनी प्रबल थी कि लंबी दूरी और रास्ते की मुश्किलें भी उनके कदम नहीं रोक सकीं.

गुमनामी में दब गई दोनों सेनानियों की कहानी

आजादी के दशकों बाद भी स्थानीय स्तर पर संघर्ष करने वाले कई स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियां इतिहास के पन्नों में पर्याप्त जगह नहीं पा सकीं. हाफिज शम्सुल जोहा और मिर्जा शौकत अली की कहानी भी इसी गुमनाम विरासत का हिस्सा है. उनकी भूमिका उस दौर की याद दिलाती है, जब अलग-अलग समुदायों के लोग देश की आजादी के साझा लक्ष्य के लिए साथ खड़े हुए थे.

आजादी का आंदोलन पूरे हिंदुस्तान का संघर्ष था

इन दोनों सेनानियों की कहानी यह संदेश देती है कि स्वतंत्रता आंदोलन किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं था. हिंदू, मुस्लिम, सिख और अन्य समुदायों के लोगों ने अपने-अपने स्तर पर अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया. गांवों और कस्बों के सामान्य लोगों ने भी इस आंदोलन को मजबूती देने में योगदान दिया.

नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत

माधोपुर जैसे गांवों में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी ऐसी अनकही कहानियों को सामने लाने की जरूरत है. स्थानीय सेनानियों के योगदान को दस्तावेजों, स्मारकों और शैक्षणिक गतिविधियों के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है. इससे युवा उन लोगों के संघर्ष को जान सकेंगे, जिन्होंने बिना किसी प्रसिद्धि की उम्मीद के देश की आजादी के लिए योगदान दिया.


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आनंद मिश्र

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By आनंद मिश्र

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