अंग्रेजों की पुलिस में थे ASI, गांधी के ‘करो या मरो’ पर छोड़ दी नौकरी, जानें सीवान के फ्रीडम फाइटर मुहम्मद मुर्तुजा की कहानी
स्वतंत्रता सेनानी मुहम्मद मुर्तजा
Siwan Freedom Fighter Muhammad Murtuza : सीवान के मुहम्मद मुर्तुजा ने 1942 में देश की आजादी के लिए अपनी ASI की नौकरी छोड़ दी. गिरफ्तारी और जेल की यातनाओं के बावजूद वे पीछे नहीं हटे. उनकी कहानी त्याग और साहस की मिसाल है.
Siwan Freedom Fighter Muhammad Murtuza : सीवान के बड़हरिया प्रखंड के रानीपुर गांव के मुहम्मद मुर्तुजा उन स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल थे, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपनी सुरक्षित नौकरी तक छोड़ दी. अंग्रेजी हुकूमत में एएसआइ के पद पर कार्यरत मुर्तुजा ने वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान पर पुलिस सेवा छोड़कर आंदोलन का रास्ता चुना. गिरफ्तारी, मुकदमा और जेल की यातनाओं के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा.
अंग्रेजों की नौकरी छोड़ आजादी की राह चुनी
भारत की आजादी का इतिहास केवल उन चर्चित चेहरों तक सीमित नहीं है, जिनके नाम इतिहास की किताबों में प्रमुखता से दर्ज हैं. देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे अनेक स्वतंत्रता सेनानी भी रहे, जिन्होंने बिना किसी व्यक्तिगत लाभ की इच्छा के आंदोलन में योगदान दिया. बड़हरिया के रानीपुर गांव निवासी मुहम्मद मुर्तुजा भी ऐसे ही गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी थे.
पुलिस में ASI थे मुहम्मद मुर्तुजा
मुहम्मद मुर्तुजा का जन्म चार दिसंबर 1919 को रानीपुर गांव में मौलवी शराफत हुसैन और बीवी हुसैन बांदी के घर हुआ था. मेधावी मुर्तुजा ने अगस्त 1938 में ब्रिटिश शासन के पुलिस विभाग में एएसआइ के पद पर नौकरी शुरू की थी. उस समय उनकी तैनाती पूर्णिया के नगर थाना खजांची हाट में थी.
‘करो या मरो’ के आह्वान ने बदली जिंदगी
वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान ने मुर्तुजा के जीवन की दिशा बदल दी. उन्होंने अंग्रेजी शासन की नौकरी छोड़ दी और खादी का कुर्ता-पायजामा तथा गांधी टोपी पहनकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए.
आंदोलन में शामिल होते ही हुई गिरफ्तारी
ब्रिटिश सरकार को उनका यह कदम स्वीकार नहीं था. आंदोलन में शामिल होने के बाद 14 अगस्त 1942 को मुहम्मद मुर्तुजा को गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी के बाद उन्हें पूर्णिया जेल भेजा गया, जहां से बाद में भागलपुर सेंट्रल जेल स्थानांतरित किया गया.
मुकदमा चला और 13 महीने की सजा हुई
मुहम्मद मुर्तुजा पर मुकदमा चलाया गया. 17 मार्च 1943 को उन्हें 13 महीने की सजा सुनाई गई. इसके बाद उन्हें हजारीबाग सेंट्रल जेल भेज दिया गया. अलग-अलग जेलों में रहने के दौरान उन्हें कठिन परिस्थितियों और प्रताड़नाओं का सामना करना पड़ा.
यातनाएं भी नहीं तोड़ सकीं हौसला
ब्रिटिश शासन की जेल में मिली यातनाओं के बावजूद मुहम्मद मुर्तुजा अपने फैसले से पीछे नहीं हटे. स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता बनी रही. नौकरी, गिरफ्तारी और सजा जैसी परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने आजादी की लड़ाई से समझौता नहीं किया.
आजादी के बाद फिर पुलिस सेवा में लौटे
देश 1947 में आजाद हुआ, लेकिन मुहम्मद मुर्तुजा के जीवन का संघर्ष यहीं समाप्त नहीं हुआ. स्वतंत्रता के बाद पुलिस विभाग में दोबारा नौकरी पाने के लिए उन्हें काफी प्रयास करना पड़ा. बाद में उनकी पुलिस सेवा में बहाली हुई और उन्होंने लंबे समय तक सेवा की.
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1978 में जमुई से हुए सेवानिवृत्त
पुलिस विभाग में अपनी सेवा पूरी करने के बाद मुहम्मद मुर्तुजा वर्ष 1978 में जमुई से सेवानिवृत्त हुए. इसके करीब एक दशक बाद दो अगस्त 1988 को उनका निधन हो गया.
इतिहास के गुमनाम नायक की कहानी
मुहम्मद मुर्तुजा का नाम स्वतंत्रता आंदोलन के चर्चित नेताओं की सूची में भले ही प्रमुखता से दर्ज नहीं हुआ, लेकिन उनका जीवन त्याग और साहस की मिसाल है. ब्रिटिश सरकार की नौकरी छोड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होना और जेल की सजा व कठिन परिस्थितियों का सामना करना उनके दृढ़ संकल्प को दर्शाता है.
नई पीढ़ी को उनके संघर्ष से मिलती है सीख
मुहम्मद मुर्तुजा की कहानी बताती है कि आजादी केवल बड़े नेताओं के प्रयासों का परिणाम नहीं थी. हजारों सामान्य लोगों ने भी अपने जीवन, करियर और सुख-सुविधाओं की परवाह किए बिना स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान दिया. ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृतियों को सामने लाना नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है.
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