1942 के आंदोलन में थाना-कचहरी पर फहराया तिरंगा, सीवान के दो स्वतंत्रता सेनानियों की प्रेरक कहानी जानिए

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सम्मान समारोह में स्वतंत्रता सेनानी कपिलदेव गिरि व आत्मा भारती

Siwan Freedom Fighters : सीवान के कोइरीगांवा गांव के स्वतंत्रता सेनानी आत्मा भारती और कपिलदेव गिरि ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी. गिरफ्तारी और डेढ़ साल जेल में रहने के बाद भी उनका संघर्ष जारी रहा. स्वतंत्रता के बाद उन्हें राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया.

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Siwan Freedom Fighters : सीवान जिले के बड़हरिया प्रखंड के कोइरीगांवा गांव के स्वतंत्रता सेनानी आत्मा भारती और कपिलदेव गिरि ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुलकर संघर्ष किया. दोनों ने बड़हरिया कचहरी कार्यालय और थाना परिसर में तिरंगा फहराकर अंग्रेजी शासन को खुली चुनौती दी.

गिरफ्तारी के बाद भी नहीं झुके दोनों क्रांतिकारी

तिरंगा फहराने के बाद दोनों स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार कर लिया गया. बताया जाता है कि अंग्रेजी पुलिस ने माफी मांगने पर रिहा करने का प्रस्ताव दिया, लेकिन दोनों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "माफी मांगने से बेहतर गोली खाना मंजूर है." इसके बाद 12 सितंबर 1942 को उन्हें सीवान दंडाधिकारी की अदालत में पेश किया गया. आठ दिन सीवान जेल में रखने के बाद 20 सितंबर को पटना शिविर जेल भेज दिया गया.

जेल से लौटे, फिर भी नहीं रुका आजादी का संघर्ष

करीब डेढ़ वर्ष जेल में रहने के बाद दोनों स्वतंत्रता सेनानी अपने गांव लौटे, लेकिन उनका संघर्ष समाप्त नहीं हुआ. वे लगातार अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलनों में भाग लेते रहे. उनके क्रांतिकारी तेवर को देखते हुए वर्ष 1946 में कपिलदेव गिरि को हजारीबाग जेल भी भेजा गया.

आजादी के बाद मिला राष्ट्रीय सम्मान

देश की आजादी के बाद आत्मा भारती और कपिलदेव गिरि को कई बार सम्मानित किया गया. वर्ष 1972 में स्वतंत्रता के 25 वर्ष पूरे होने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दोनों स्वतंत्रता सेनानियों को ताम्रपत्र प्रदान किया. 1973 में स्वतंत्रता की रजत जयंती समारोह में उन्हें गौरव प्रतीक चिह्न और प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया. बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी उन्हें दिल्ली बुलाकर चांदी का मेडल और शॉल भेंट कर सम्मानित किया.

परिजनों ने साझा की गौरवशाली विरासत

आत्मा भारती के पुत्र मंकेश्वर भारती ने बताया कि उनके पिता को मिले ताम्रपत्र, मेडल और सम्मान केवल पुरस्कार नहीं हैं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष और यातनाओं की अमूल्य धरोहर हैं. वहीं कपिलदेव गिरि के नाती संजय गिरि ने बताया कि बिहार के प्रथम उपमुख्यमंत्री डॉ. अनुग्रह नारायण सिंह और महामाया प्रसाद उनके घर आते-जाते थे. उन्होंने यह भी बताया कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान दारोगा प्रसाद राय और कपिलदेव गिरि को एक ही हथकड़ी में बांधकर हजारीबाग जेल ले जाया गया था.

इतिहास को सहेजने की उठ रही मांग

स्थानीय समाजसेवियों का कहना है कि स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाने वाले इन दोनों सेनानियों के योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है. इसके लिए शासन-प्रशासन को उनकी स्मृति में नियमित कार्यक्रम, संगोष्ठी और स्मृति समारोह आयोजित करने चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान से प्रेरणा ले सकें.

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आनंद मिश्र

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