हर मजहब को देने में...देश अलौकिक भारत है

— गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कवि गोष्ठी सह मुशायरासीतामढ़ी : जिले की साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर रविवार को डुमरा स्थित गीता भवन में कवि गोष्ठी सह मुशायरा का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता ई शचींद्र कुमार हीरा ने की. मंच संचालन गीतकार गीतेश ने किया. […]
— गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कवि गोष्ठी सह मुशायरासीतामढ़ी : जिले की साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर रविवार को डुमरा स्थित गीता भवन में कवि गोष्ठी सह मुशायरा का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता ई शचींद्र कुमार हीरा ने की. मंच संचालन गीतकार गीतेश ने किया. कार्यक्रम का आगाज शफी आजिज की गजल ‘मुकद्दस ये जमीं इस पे हंसी इनसान रहते हैं, ये इन्सां वो है जिसमें राम और रहमान रहते हैं’ से हुआ. सुरेश लाल कर्ण ने अपनी रचना ‘बापू तुम अगर अभी होते आंखें तेरी भी नम होती’ से आज के हालात को दर्शाया. तौहीद अश्क की रचना ‘सबसे अच्छा है प्यारा है गुलशन मेरा, सबकी आंखों का तारा है गुलशन मेरा’ ने देशभक्ति को रुपायित किया. डॉ शत्रुध्न प्रसाद यादव की रचना ‘जात पात और धर्म कर्म का भेद न हो कोई घर में’ अधिवक्ता अशोक कुमार सिंह की ‘अंधियारा जिनका साथी है, किरणों से परिचय क्या होगा’ ने महफिल को गति प्रदान की. आंचलिक कवि रामबाबू सिंह की रचना ‘दारोगा का झन्नाटेदार थप्पड़ खाकर चोर देर तक गाल सहलाता रहा’ संवेदना के कवि सुरेश वर्मा की कविता ‘उजड़ा सा खाली’ और विरान दिखता है, एक मां के नहीं होने से घर कितना सुनसान दिखता है’ एवं ई शचींद्र कुमार हीरा की रचना ‘जो नाप लेते हैं नजरों से सागर की गहराई वे बहुत पारखी और हुनरमंद हैं’ ने इंद्रधनुषी छटा बिखेर दी. गीतकार गीतेश ने अपनी रचना ‘हर मजहब को देने में आदर हासिल जिसे महारत है, मैं हीं क्या सब कहते हैं वह देश अलौकिक भारत है’ से भारत का गौरव गान किया.
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