इबादत व दुआओं में गुजरी रात, मगफिरत के लिए कब्रिस्तानों में उमड़े अकीदतमंद

Author Alok kumar
Updated:
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शब-ए बारात पर मुसलमान भाईयों ने पूरी रात इबादत की और अपने अजीजों व पुरखों के लिए मगफिरत (मोक्ष) की दुआएं मांगी.

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छपरा. शब-ए बारात पर मुसलमान भाईयों ने पूरी रात इबादत की और अपने अजीजों व पुरखों के लिए मगफिरत (मोक्ष) की दुआएं मांगी. शाम होते ही शहर के करीमचक, राहत रोड नयी बाजार, गुदरी, खनुआ, ब्रह्मपुर, सहित अन्य मुस्लिम इलाके में चहल पहल बढ़ने लगी. मस्जिद व कब्रिस्तान रोशनी से जगमगा उठे. महफिलों में उलेमा ने तकरीर कर इस रात की अहमियत पर रोशनी डाली.

ईशा की नमाज के बाद कुरान की तिलावत, इबादत और कब्रिस्तानों की जियारत शुरू हुई. लोगों ने अपने पूर्वजों के मगफिरत की दुआएं मांगी. घरों में तरह-तरह के हलवे बनाने की परंपरा भी निभाई गयी. वहीं खिचड़ा बनाकर फातेहा और गरीब, रिश्तेदारों व दोस्तों को तकसीम किया गया. वैसे तो शब-ए-बरात सादगी से मनाया जाता है. मगर बच्चों ने आतिशबाजी करके इसका लुत्फ भी उठाया. कब्रिस्तान और मस्जिदों तक पहुंचने में लोगों को दिक्कत न हो इसके लिए रोशनी का प्रयाप्त इन्तेजाम किया गया था. इसी बहाने मस्जिद और कब्रिस्तान में रंगीन लाइट की खूब सजावट की गयी, जिससे माहौल उत्सवी और खुशनुमा हो उठा. हालांकि जियारत के लिए बाहर निकलने वालों की तादाद में कमी दिखी और लोगों ने घरों या मस्जिद में इबादत करने और दुआ मांगने को तरजीह दिया.

शब-ए-बरात मनाने की परम्परा

मौलाना नेसार अहमद मिस्बाही के अनुसार ईस्लामिक कैलेंडर के आठवें महीने को शाबान कहते हैं और उस महीने की 15वीं तिथि को शब-ए-बारात के नाम से जाना जाता है. मुस्लिम समुदाय के बीच इसे वह रात मानी जाती है जब अल्लाह ताला की अपने बंदों की तरफ खास तवज्जो होती है. बंदों के पास यह मौका होता है कि गुनाहों की माफी मांग ली जाय. साथ ही अल्लाह से उन तमाम लोगों के भी गुनाह माफ कर उन्हें जन्नत में जगह देने की दुआ करते हैं जो दुनिया से गुजर गये हैं.

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